Thursday, October 8, 2015

सपने में सेल्यूलर जेल

वैसे जेल जाना कोई गर्व की बात नहीं है। लेकिन अगर कोई काला पानी की सेल्यूलर जेल गया हो तो इससे ज्यादा गर्व की और कोई बात नहीं हो सकती। सेल्यूलर जेल के बारे में आज का यूथ ज्यादा जानता नहीं है। इसलिए कि पिछले साठ वर्षों में हमें आजादी का इतिहास तो मिला नहीं लेकिन इतिहास को अपनी जरूरत के हिसाब से लिखने की आजादी जरूर मिल गई।
परिणाम ये है कि मैंने एक बच्चे से पूछा-भगतसिंह के बारे में क्या जानते हो? उसने जवाब दिया कि भगतसिंह वह जिसका रोल बॉबी देओल, अजय देवगन और मनोज कुमार ने अलग-अलग फिल्मों में किया है। सचमुच इतिहास के प्रति लापरवाही ने हमारे वर्तमान की ये हालत बना दी है।
हमारे प्रजातंत्र और आजादी की रक्षा के लिए यह जरूरी है कि एक ऐसा कानून जरूर बने जिसमें राजनीति में जाने से पहले हर आदमी के लिए यह जरूरी हो जाए कि वह एक बार पोरबन्दर और एक बार सेल्यूलर जेल अवश्य जाए। वह गाँधीजी के जन्मस्थल तथा सशस्त्र क्रांतिकारियों के वधस्थल पर गए बिना आजादी की अनमोलता को ठीक से नहीं समझ सकता।
लेकिन हमारे देश में प्रजातंत्र का खेल ही अजीब है। यहाँ तंत्र को प्रजा के हिसाब से नहीं चलना पड़ता। प्रजा को तंत्र के इशारों पर चलना पड़ता है। तंत्र काम को नहीं देखता। सर्टिफिकेट को देखता है। काम भले ही आपने किया हो या नहीं, सर्टिफिकेट जरूरी है। फाइल में वही लगता है लिहाजा पोर्टब्लेयर यात्रा के दौरान जब मैं सेल्यूलर जेल देखकर निकला तो मैंने वहाँ के अधिकारी से सर्टिफिकेट माँग लिया। उसने पूछा- किस बात का सर्टिफिकेट? मैंने कहा-इस बात का कि मैं सेल्यूलर जेल में आया था। उसने पूछा-क्या करोगेे? मैंने जवाब दिया समय आने पर स्वतंत्रता सेनानी कहलाने की तिकड़म भिड़ा लूँगा। बाद में कौन देखता है कि मैं कब किस वजह से यहाँ आया? हमारा तंत्र सिर्फ सर्टिफिकेट देखता है। असलियत कहाँ देखता है?
खैर सेल्यूलर जेल देखकर मैं सर्किट हाउस लौटा तो बिस्तर पर लेट गया। लेटते ही मुझे नींद आ गई। नींद में सपना आया। सपने में मुझे लगा कि जैसे भारत में यह कानून बनकर लागू भी हो गया है कि राजनीति में वही आदमी आ सकेगा और रह सकेगा जिसने कम से कम एक बार सेल्यूलर जेल के दर्शन किए हों। लिहाजा वर्तमान और पूर्व नेताओं के जत्थे जेल के दर्शनार्थ आने लगे। इधर जिन क्रांतिकारियों को इस जेल में फाँसी हुई थी मेरे सपने में पुन: जी उठे। उन्होंने जेल का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया है। सभी पार्टियों के नेताओं का पहला जत्था ज्योंही जेल में घुसा क्रान्तिकारी फटी-फटी आँखों से उन्हें देखने लगे। एक ने दूसरे से कहा-हमें तो सूचना थी कि हमारे आज के नेता आने वाले हैं। इनकी शक्ल देखकर तो लगता है कि ये नेता नहीं हो सकते। फटाफट इनका रिकार्ड चैक करो। रिकार्ड देखते ही पता चला कि जत्थे के कई माननीय सदस्यों पर हत्या, अपहरण, बलात्कार आदि के कई मुकदमे चल रहे हैं। बस फिर क्या था। एक सीनियर क्रान्तिकारी ने आदेश दिया कि जेल का दरवाजा बन्द कर दो। ध्यान रहे कि ये यहाँ से निकल न जाएँ। अगर ये वापस चले गए तो देश को एक जेल बना देंगे। आजादी और लोकतंत्र के लिए ये बेहद खतरनाक है।
सेल्यूलर जेल का दरवाजा बन्द कर दिया गया। नेता लोग बाहर निकलने के लिए छटपटाने लगे। एक नेता ने तो क्रान्तिकारी अधिकारी को सस्पेन्ड कराने की धमकी भी दे दी। खैर साहब, वह क्रान्तिकारी कोई सरकारी अफसर तो था नहीं इसलिए उसे गुस्सा आ गया। उसने अपने साथियों से कहा-जाओ वह अंग्रेजों वाला हंटर लाओ। इनके साथ वह सब करो जो अंग्रेजों ने हमारे साथ किया था। खैर तभी मेरी नींद खुल गई। सपना टूट गया। काश वह सपना सच हो जाता। लेकिन इतने अच्छे सपने सच कहाँ होते हैं?
-सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


सुरेन्द्र दुबे (जयपुर) की पुस्तक
'डिफरेंट स्ट्रोक'
में प्रकाशित व्यंग्य लेख

सम्पर्क : 0141-2757575
मोबाइल : 98290-70330
ईमेल : kavidube@gmail.com

Wednesday, October 7, 2015

फिक्सिंग के पीछे क्या है?

हमारी समझ में कुछ भी नहीं आता था, जब किसी दुर्दान्त बल्लेबाज के आउट होते ही कमेन्ट्रेटर बताता था कि ये नब्बे मिनिट क्रीज पर रहे, कुल छप्पन गेंदों का सामना किया और इन्होंने चार बहुमूल्य रन बनाये।
मैं कतई नहीं समझ पाता था कि वे चार रन बहुमूल्य कैसे थे, लेकिन जब से मैच फिक्सिंग करने वाले खिलाडिय़ों की कलई खुली है तब से हर कोई समझ गया है कि वे चार रन बहुमूल्य ऐसे थे!
बीस से कम रन बनाने पर कम से कम बीस लाख रूपये मिलने का एग्रीमेन्ट था। इसीलिए अगर वह एक रन भी नहीं बनाता तब भी तयशुदा रुपया तो मिल ही जाता। लेकिन क्रीज पर जाते ही मन नहीं माना। आखिर देशभक्ति भी तो कोई चीज होती है, इसलिए चरण कमलों को तकलीफ देनी पड़ी। अन्तत: चार बेशकीमती रनों का योगदान दे ही दिया। इसे कहते हैं देशभक्ति!
दरअसल वे चार रन 'बेशकीमती' नहीं अपितु 'बेसकीमती' थे, क्योंकि उनका बेस बहुत कीमती था। यानि एक बार बाइस गज तेज दौडऩे की कीमत या लागत पाँच लाख रुपये। कुल अट्ठासी गज दौडऩे का मूल्य हुआ, पूरे बीस लाख रुपये। बहुत थकान हुई होगी इतना दौडऩे में हमारे लाड़ले बल्लेबाज को।
हमारे शहर के क्रिकेट विशेषज्ञों की मेरिट में पनवाड़ी के बाद मेरा ही नम्बर आता है। बाद में इसलिए कि जब मैं उसकी दुकान पर खड़ा होकर तर्क लड़ाता हूँ तब वह मुझे फोकट में पान खिलाता है। मेरिट भी इसी दौरान बन रही होती है। अत: मुझे लिहाज में नैतिकतावश दूसरे नम्बर पर रहना पड़ता है। जब मैं खुद मुफ्त के पान के चक्कर में पनवाड़ी का इतना लिहाज रखता हूं तब नैतिकता से ओत-प्रोत हमारे खिलाड़ी लाखों रुपयों का गुप्त लाभ पहुँचाने वाले सटोरियों का लिहाज क्यों न रखें?
अगर आपको यह भ्रम है कि आप क्रिकेट की तमाम बारीकियों से वाकिफ हैं तब आप उस भ्रम को पुख्ता करने के लिए सटोरियों औैर उनके हैरतअंगेज कारनामों के रिकॉड्र्स को भी रट लीजिये, नहीं तो आप क्रिकेट में मिडिलची ही कहलायेंगे। 'मैच फिक्सिंग' इस खेल का एडवान्स कोर्स है अर्थात् एक जरूरी डिप्लोमा। इसे कहते हैं डवलपमेन्ट जो कम से कम क्रिकेट ने ही तो किया है।
सटोरिये भी हमारे खिलाडिय़ों पर पूरी तरह अभिभूत हैं। इतने ऊँचे चरित्र वाले खिलाड़ी उन्हें आसानी से और कहाँ मिल सकते हैं? वे जानते हैं कि उस बल्लेबाज का एग्रीमेंट तो सिर्फ इतना सा था कि उसे बीस लाख रूपयों के बदले बीस से कम रन बनाने थे। उसने न केवल चार ही रन बनाये बल्कि दो साथी खिलाडिय़ों को रन आउट भी करवाया। इस महान योगदान के लिए अतिरिक्त राशि की मांग भी नहीं की। इतना ही नहीं जब तक हार सुनिश्चित नहीं हो गई तब तक पट्ठा मैदान में डटा रहा। बेईमानी का काम पूरी ईमानदारी से करने में हमारे खिलाडिय़ों का कोई जवाब नहीं है।
अब इन सवालों पर चर्चा करके समय बर्बाद करने की कोई जरूरत नहीं रह गई है कि निर्णायक क्षणों में अमुक गेेंदबाज विकेट क्यों नहीं ले पाता है? संकट के समय कप्तान जरूरी गेंदबाज को गेंद क्यों नहीं थमाता है? संघर्ष की बजाय धाकड़ बल्लेबाज नाजुक मोड़ पर क्यों अपना विकेट आसानी से खो देता है? आखिर लिहाज और नैतिकता का ही दूसरा नाम तो मैच फिक्सिंग है।
हम इतने बेवकूफ निकले कि क्रिकेट को युद्ध की तरह देखने लगे और खिलाडिय़ों को सीमा प्र्रहरी सैनिकों जैसा मानने लगे। यह तो अच्छा हुआ कि हमने युद्ध को क्रिकेट की तरह नहीं देखा। वरना हम सैनिकों को भी क्रिकेटरों जैसा समझने लग जाते। तब सचमुच बड़ा अनर्थ हो जाता। क्रिकेटर्स जैसा कहलवाने पर सैनिकों का क्या सम्मान रह जाता। आखिर देशभक्ति और दुकानदारी में अन्तर तो करना ही चाहिए। तभी तो हम छाती ठोक कर कहते हैं कि हम उतने बेवकूफ भी नहीं हैं।
-सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


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Tuesday, October 6, 2015

सकारात्मक क्रिकेट

हमारे नेताओं और क्रिकेटरों में कम से कम एक फर्क तो जरूर है। वह यह कि हमारे नेता अक्ल के पीछे लट्ठ लेकर घूमते हैं और हमारे क्रिकेटर लट्ठ के पीछे अक्ल लेकर। घूमते दोनों ही है। कई बार तो ये घूमते-घूमते इतना घूम जाते हैं कि इन्हें देखकर 'यू टर्न' भी शर्मसार हो जाता है।
कुछ भी हो परिणाम एक ही है। यहाँ सरकार की दुर्गति हो रही है तो मैदानों में भारतीय क्रिकेट टीम की। इनकी परफोरमेंस से जनता निराश है तो उनकी परफोरमेंस से क्रिकेट प्रेमी हताश हैं। लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद हमारी भारत सरकार की प्रमुख पार्टी अनेक राज्यों के विधानसभा चुनावों में हार गई। उधर घरेलू पिचों पर कुछ मैच जीतने के बाद हमारी क्रिकेट टीम विश्वकप में अपना सूपड़ा साफ करवा बैठी।
दरअसल सरकार और क्रिकेट टीम दोनों की दशा और दिशा एक जैसी है। कप्तान अगर अच्छा खेलता है तो टीम के बाकी सदस्य फिसड्डी साबित होते हैं। लेकिन जब टीम के बाकी सदस्य ठीक-ठाक प्रदर्शन करते हैं तो कप्तान लीद कर देता है। भारतीय क्रिकेट टीम में फिटनेस की समस्या है तो सरकार के मंत्रीमंडल में फाइटनेस की। नेताओं और क्रिकेटरों का फिटनेस लेवल सिर्फ इतना सा है कि वे आपस में फाइट करने के अलावा और कुछ कर ही नहीं सकते।
सबसे बड़ी समस्या तो कोच और सोच की है। सरकार के पास कोच है ही नहीं तो सोच कहाँ से आएगी? उधर भारतीय क्रिकेट में कोच की सोच ही सबसे बड़ी समस्या साबित हुई है। दोनोंं का मिडिल ऑर्डर हमेशा दबाव में रहता है। यहांँ मंत्रीमंडल के गठन को लेकर विवाद है तो वहाँ टीम के गठन को लेकर। दोनों में बारहवांँ खिलाड़ी तक कप्तान बनने की जुगत भिड़ाता रहता है।
क्रिकेट टीम में कुछ खिलाड़ी टीम पर बोझ बने हुए हैं तो इधर कुछ मंत्री सरकार पर भार हैं। लेकिन इस बोझ को अगर हटा दें तो इधर सरकार उड़ जाएगी और उधर टीम बिखर जाएगी।
कथनी और करनी का अन्तर दोनों ही जगहों पर मौजूद है। क्रिकेटर बात तो 'सकारात्मक क्रिकेट' खेलने की करते हैं लेकिन मैदान में उतरते ही 'सरकारात्मक क्रिकेट' खेलने लगते हैं। उधर हमारे प्रधानमंत्री 'क्रिकेटात्मक सरकार' चलाने के लिए मजबूर हैं।
दोनों ही कम बोलते हैं। दोनों ही विनम्र हैं। दोनों ही अक्सर हार जाने के अभ्यासी हैं लेकिन दोनों ही टीम की जीत के लिए एकल प्रयास करते हुुए दिखाई देते हैं। सामने वाली टीम के अधिक खराब प्रदर्शन की वजह से कभी कभार एक-आध मैच भी जीत लेते हैं। दोनों की अपने-अपने चयनकर्ताओं के साथ सैटिंग इतनी तगड़ी है कि इनका प्रदर्शन चाहे कितना भी खराब क्यों न हो, इन्हें हटाया नहीं जा सकता।
-सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


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Monday, October 5, 2015

मैच फिक्सिंग ट्रेनिंग सेन्टर

सावन के अन्धे को हरा ही हरा दिखता है और क्रिकेट के अन्धे को फिक्सिंग ही फिक्सिंग। मैं सावन में तो अन्धा हुआ नहीं, क्रिकेट में हो गया। क्रिकेटान्धता की असीम अनुकम्पा से मुझे दिव्य-दृष्टि प्राप्त हुई। मेरे प्रज्ञा चक्षु अचानक खुल गए और मुझे घर-घर में, हर तरह की मैच फिक्सिंग के विविधरूपा दर्शन होने लगे।
मैच देवरानी और जेठानी नामक दो खूँखार एवं परम्परागत प्रतिद्वंद्विनियों के बीच था। अवसर था घर में सामानों का बँटवारा। खिलाडिय़ों में संघर्ष था और दर्शकों में रोमांच। पर देखते ही देखते मैच में एक नाटकीय मोड़ आया। संघर्ष और रोमांच दोनों एक साथ गायब हो गए क्योंकि अब सास नामक सामान का नम्बर था। दोनों ही मैच हार जाने की जी तोड़ कोशिश करने लगीं। क्रिकेट की भाषा में इसे कहेंगे ''डबलमैच फिक्सिंग।''
सास के पास उस बहु के साथ रहने के अलावा कोई चारा नहीं था जिसके हिस्से में उसे फिक्सिंग ने ला पटका था। बेचारी को लोक-लाज के आभूषण धारण करने का खामियाजा उठाना पड़ रहा था। लिहाजा अपने पालतू पति को विश्वास में लेकर उसे मैच फिक्स करना पड़ा। उस दिन मैच शुरू से ही रोमांचक हो चला था। जितनी सधी हुई गेंंदबाजी उतनी ही दमदार बल्लेबाजी। क्षेत्ररक्षण भी दोनों ही ओर से लाजवाब था। बहुत धैर्य से बल्लेबाजी कर रही सास की एकाग्रता अचानक भंग हुई। बस उसके मुँह से एक गलत वाक्य निकला कि ''मैं तुम्हारे साथ नहीं रहना चाहती।'' पुुत्र ने तुरन्त अनुपालना कर डाली, आखिर वह आज्ञाकारी जो ठहरा। बहु को मनवांछित फल की प्राप्ति हुई। क्रिकेट की भाषा में इसे कहेंगे ''अम्पायर के जरिये मैच फिक्सिंग।''
जेठानी के लड़के का विवाह होना था। घर में भगवान का दिया सब कुछ था, इसलिए माँगा कुछ भी नहीं था। सिर्फ सेवाभावी लड़की चाहिए थी। लेकिन लड़की का बाप अतिसज्जन निकला। उसने बिना माँगे ही, मना करने के बावजूद सब कुछ दिया। कलर टी.वी, फ्रिज, वाशिंग मशीन, कूलर, स्कूटर आदि। घर में बँटवारे के बाद हिस्से में आये दो कमरों वाले फ्लैट में इतनी जगह कहाँ थी कि दहेज में प्राप्त यह इतना सारा सामान रखा जा सके। मजबूरी वश लाड़ले बेटे और बहु को तुरन्त अलग करना पड़ा। बिना हिंसा और तनाव के परिवार बँट गया। लड़की के बाप का सपना साकार हुआ। क्रिकेट की भाषा में इसे कहेंगे, ''प्रायोजक द्वारा मैच फिक्सिंग।''
मैच फिक्सिंग के वातावरण में पल बढ़कर जब हमारे लाड़ले राष्ट्रीय क्रिकेट टीम की शोभा बढ़ायेंगे तब उन्हें इसके लिए अतिरिक्त कोचिंग की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। घर-घर में मैच फिक्सिंग का सतत् प्रशिक्षण निर्बाध गति से जारी है। मैदान में होने वाली मैच फिक्सिंग की जाँच तो सी.बी.आई. कर लेगी पर घर-घर में हो रही ऐसी फिक्सिंग की जाँच कौन करेगा? अस्तु, राजिया का प्रसिद्ध सोरठा याद आ रहा है-
डूंगर बळती लाय, दीखे सबने सामने।
पगां बळंती हाय, रत्ती न दीखे राजिया।।

सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


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Sunday, October 4, 2015

जलवे बाबा पैथी के

बेवकूफ था मुन्नाभाई। डाक्टर बनने के लिए फर्जीवाड़े से एम.बी.बी.एस. करने की जरूरत क्या थी? फिजूल ही इतने पापड़ बेले। पाखण्ड पूर्वक किसी बाबा का रूप धारण कर लेता और शुरू कर देता बाबागिरी। फिर उसे खुले आम डाक्टरी करने से कौन रोकने वाला था?
आजकल हमारे यहांँ डाक्टर बनने का शॉर्टकट है बाबागिरी। बाबा घोषित होते ही रास्ता साफ और मंजिल आसान। फिर आप कभी भी, कहीं भी और कैसे भी किसी भी बीमारी का इलाज कर सकते हैं। डाक्टरों पर सौ कानून है लेकिन बाबाओं पर कोई कानून नहीं। कोई थप्पड़ मारकर तो कोई लात मारकर इलाज कर रहा है। कोई मरीज के शरीर पर कौड़े बरसा रहा है, कोई मरीज के जिस्म में कीलें ठोक रहा है तो कोई ब्लेड से चीरे लगा रहा है। कोई सिर्फ  मरीज के जिस्म को छू देता है तो कोई कबूतर छुआकर कर रहा है इलाज। जो पाखण्डी जितना बड़ा सनकी वह उतना ही बड़ा डाक्टर । वाह! क्या अदा जलवे तेरे बाबा।
मैने एक पाखण्डी बाबा से कहा- आप तो बिना एनेस्थिसिया, बिना आपरेशन थिएटर, ब्लेड से ऑपरेशन कर रहे हैं। यह काम तो एलौपेथी करती है। आप जो कुछ कर रहे हैं वह साइन्स की दृष्टि से गलत है। मेरी बात सुनते ही बाबा बिफर गए। कहने लगे -'जानती क्या है तुम्हारी साइन्स और एलोपेथी? नजर लगने की बीमारी का इलाज है तुम्हारी साइन्स के पास? ऊपरी हवा का इलाज कर सकती है तुम्हारी साइन्स? इनका इलाज एलौपेथी में नहीं, बाबा पैथी में होता है।'  
बाबा की बात सुनते ही मुझ अज्ञानी के चक्षु खुल गए। मैं सोचने लगा कि इन पाखण्डी बाबाओं की बाबागिरी के सामने लगती कहाँ है बेचारे डाक्टरों की डाक्टरी? सप्ताह में हार्ड ड्यूटी के बाद सिर्फ  एक वीकली ऑफ। उसमें भी इमरजेन्सी कॉल पर जाओ। नाइट ड्यटी करो। मेले में ड्यूटी बजाओ। मिनिस्टर का दौरा हो तो एक टाँग पर खड़े रहो। उधर बाबागिरी में एक दिन काम और महीने में उनतीस दिन आराम। मिनिस्टर भी आएगा तो बाबा का आशीर्वाद लेकर जाएगा। डाक्टर के बजाय बाबागिरी में फ्यूचर ज्यादा ब्राइट है।  
भरपूर मेहनत के बावजूद लगातार दो बार पी.एम.टी. की परीक्षा में गच्चा खा चुके एक स्टूडेंट ने मृुझसे पूछा-''अब मैं क्या करूँ?'' मैंने किसी एक्सपर्ट कैरियर कन्सल्टेन्ट की तरह जवाब दिय ''तुरंत बाबा बन जाओ। डाक्टर बनकर अस्पताल खोलने की मंशा का त्याग करो। बाबा बनकर आश्रम खोलने की सोचो। फैला दो अपने चमत्कारों की अफवाह। करोड़ों अंधविश्वासी तुम्हारे इन्तजार में तड़प रहे हैं। भगवान की गुडविल अनलिमिटेड है। उन्हें तो इसे भुनाने की फुर्सत है नहीं। बाबा बनकर तुम ही भुना लो।''
मेरी बात सुनते ही उसकी आँखो में चमक आ गई। उसने पूछा-''लेकिन इससे फायदा क्या है? मैंने जवाब दिया-बाबागिरी से इलाज करने के तो कई फायदे हैं। न तो अस्पताल की बिल्डिंग चाहिए और न ही मँहगी मशीनें। न वार्ड चाहिए न आपरेशन थिएटर। लैब, एक्सरे, सोनाग्राफी की कोई जरूरत ही नहीं। क्वालीफाइड और टे्रन्ड स्टाफ भी नहीं खोजना। बाबा इज आल इन वन। डाक्टर तो कुछ खास बीमारियों के मरीज ही देखता है लेकिन बाबा किसी भी बीमारी का इलाज कर सकता है। कैंसर और एड्स जैसी लाइलाज बीमारियों के शर्तिया इलाज का धडल्ले से दावा कर सकते हैं आप, लेकिन बाबा बन जाने के बाद। बीमारी कुछ भी हो बाबा की वही चुटकी भर भभूत सबका इलाज कर देती है और वह भी बिना फीस के। बाबाओं से घबराकर ही तो समझदार डाक्टर विदेश भाग जाते हैं। बड़े जलवे हैं इस बाबापैथी के।''
अब उसे बाबागिरी में अपना सुनहरा कैरियर नजर आ रहा था। मेरी बातों से सहमत होते हुए उसने अन्तिम प्रश्न पूछा-''लेकिन बिना क्वालिफीकेशन के मैं बीमारी का डाईग्नोसिस कैसे करूँगा? मैंने कहा-''सीधा सा तरीका है। चढ़ावे में आया हुआ कोई नारियल उठाओ। उसे मोबाइल फोन की तरह कान और मुंँह के बीच लगाओ। भगवान से बात करने का ड्रामा करो। उनसे पारामर्श लेकर दे दो वही चुटकी भर भभूत। अरे बेवकूफ। सिर्फ बाबागिरी ही तो एक अकेला ऐसा फील्ड है जिसमें अयोग्यता ही सबसे बड़ी योग्यता है।''


सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


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Saturday, October 3, 2015

सरस्वती जी का त्याग पत्र

पिछले दिनों सरस्वती जी ने ब्रह्माजी को यह कहते हुए त्याग पत्र दे दिया कि अब मुझे नहीं रहना सरस्वती। आप मेरी जगह किसी अन्य सरस्वती को नियुक्त कर दीजिए। ब्रह्माजी ने पूछा-''देवी आप इतनी कुपित किसलिए हैं। ऐसा क्या हो गया जो आप अपना पद त्याग देने को आमादा हैं? सरस्वती जी ने जवाब दिया-''मैं अभी-अभी एक कवि सम्मेलन सुनकर आ रही हूँ। उस कवि सम्मेलन को सुनने के पश्चात् मैंने यह तय किया है कि अपने पद पर बने रहने का अब मुझे अधिकार नहीं है। नैतिकता के नाते मुझे अपना पद छोड़ देना चाहिए।''
ब्रह्माजी ने पूछा- देवी! ऐसा क्या हो गया उस कवि सम्मेलन में जो आप अपना पद छोड़ देने पर आमादा हैं? सरस्वती जी ने जवाब दिया-''क्या-क्या नहीं हुआ? कवि कह रहा था कविता मेरी है और कविता कह रही थी मैं दूसरे की हूँ। कवि कह रहा था कि जो रचना मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ, यह कविता है। और वह रचना कह रही थी कि मैं चुटकुला हूँ। आप ही बताओ इन टिपीकल मुकदमों का फैसला कैसे किया जाए?''
सरस्वती जी की बात सुनकर ब्रह्माजी का दिमाग चकराने लगा। उन्होंने कहा-''देवी! लेकिन ये सारे कवि तो आपके ही उपासक हैं। इन्हें समझा दीजिए। त्याग पत्र देने की क्या जरुरत?'' लेकिन बीच में ही बात काटते हुए सरस्वतीजी ने कहा- ''आपको पता नहीं है प्रभो! आजकल के कवि बड़े चालाक हो गए हैं। ये ऊपर से तो मुझमें श्रद्धा दर्शाते हैं लेकिन सच्चे मन से प्यार लक्ष्मी जी से ही करते हैं। ऐसे में उचित यह रहेगा कि आप मेरे डिपार्टमेंट का एडीशनल चार्ज लक्ष्मी जी को ही दे दें। रही इन मुकदमों की बात तो इनका फैसला तो उनका वाहन ही कर देगा। जाति बिरादरी का फैसला तो वैसे भी भारतीय न्याय शास्त्र में सर्वमान्य होता है।''
ब्रह्माजी बोले-''देवी आपका सुझाव बुरा नहीं है। लेकिन मैं आपका त्याग पत्र स्वीकार नहीं करुँगा। आप मुझे बताएँ कि आजकल के इन कवियों से आप क्या कहना चाहती हैं? मैं अभी सबको एस.एम.एस. कर देता हूँ। सब ठीक हो जाएँगे।''
ब्रह्मा जी की बात सुनकर सरस्वती जी ने कहा, ब्रह्मा जी आप आजकल के इन कवियों को एक एस.एम.एस. करने की रिस्क नहीं उठाएँ। वे इतने जुगाडू हैं कि आपके द्वारा किए गए एस.एम.एस. को ही कविता कहकर सुना देंगे। सरस्वती जी का तर्क सुनकर निरुत्तर हुए ब्रह्मा जी बोले- तब देवी आप ही अब इस समस्या का उपाए सुझाएँ।
इस पर ब्रह्माजी से सरस्वती जी ने जो कहा वह संस्कृत भाषा में एक श्लोक के रूप में था। उस श्लोक का हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है- हे ब्रह्माजी! आप इन कवियों को समझाइये कि कविता नहीं लिखने से न तो अपयश मिलता है। न किसी प्रकार की कोई व्याधि होती है, न पाप लगता और न ही नरक की प्राप्ति होती है। लेकिन बुरी कविता लिखने से और चुराई हुई कविता सुनाने से तथा चुटकुले को कविता बताने से इन चारों की प्राप्ति एक साथ होती है।
सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


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Friday, October 2, 2015

मास्टर जी की आत्मकथा


एक सरकारी स्कूल में टीचर बनकर मैं बहुत प्रसन्न था क्योंकि बड़ी मुश्किल से मुझे बेरोजगारी से निजात मिली थी। लेकिन मेरी खुशी ज्यादा दिन नहीं टिकी। गर्मियों की छुट्टियाँ बिताने के लिए आत्मगौरव से अभिभूत होकर जब मैं अपने गाँव पहुँचा तो एक बुजुर्ग ने मुझसेे पूछ लिया-''तेरी कहीं नौकरी लग गई है या अभी तक मास्टरी ही कर रहा है?'' दरअसल जिस मास्टरी को मैं जिन्दगी समझ रहा था उसे वे नौकरी मानने के  लिए भी तैयार नहीं थे।
खैर, मुझे उनसे क्या? मेरी खुशियों के क्षितिज सबसे अलग थे तो मेरी पीड़ाओं के पहाड़ भी सबसे अलग। मैं अच्छी तरह जानता था कि मैं गुरु नहीं शिक्षक हूँ। लेकिन लोग जब मुझे गुरुजी के नाम से संबोधित करते तो मैं उतना ही प्रसन्न होता जितना थानेदार के नाम से पुकारे जाने पर पुलिस का नया-नया काँस्टेबल खुश होता है।
अभी मैैंने टीवी के समाचारों में देखा है कि राष्ट्रपति के पद से रिटायर होने के बाद हमारे पूर्व राष्ट्रपति माननीय कलाम-सा एक स्कूल में जाकर बच्चों की क्लास ले रहे हैं। मैं सोचने लगा कि इन्हें मास्टर बनने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़े। पहले वैज्ञानिक बने। फिर राष्ट्रपति बने रहे तब जाकर स्कूल में पढ़ाने का मौका मिला। मैं कितने फायदे मेें रहा। बी.एड. की और डायरेक्ट मास्टर बन गया।
मैं थर्डग्रेड में टीचर था। यानी शिक्षकों में सबसे निचले दर्जे का शिक्षक। प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने वाला। लोग भी कहते रहते थे कि असली शिक्षक तो वही है जो प्राइमरी स्कूल में क ख ग सिखाता है। लेकिन दूसरी असलियत यह थी कि स्कूल में मेरे पद से नीचे के पद पर सिर्फ चपरासी का पद ही होता था। जिस स्कूल में चपरासी का पद न हो वहाँ मैं चपरासी भी होता था। हैड मास्टर जी न हों तो वह भी मैं ही। मेरे चारों तरफ जिम्मेदारियाँ ही जिम्मेदारियाँ। अधिकार कुछ भी नहीं। इसे कहते हैं सच्चा राष्ट्र निर्माता।
स्कूल की बिल्डिंग टूटी-फूटी है तो बाहर बैठ कर पढ़ाओ। टाइम पर आओ और टाइम पर जाओ। नियमित पोषाहार का वितरण करवाओ। सूचनाएँ बनाकर ऊपर भिजवाओ। ये सब गंभीरता से करो फिर चाहे पढ़ाओ या ना पढ़ाओ।
शिक्षक एक मल्टीपरपज सरकारी कर्मचारी है। उससे अपेक्षा की जाती है कि वह नामांकन बढ़ाए, प्रवेशोत्सव मनाए, टूर्नामेंट कराए। ये सर्वे करे-वो सर्वे करे, ये गणना करे-वो गणना करे। सरकार गिर जाए तो चुनाव करवाए। मतदाता सूचियाँ बनाए। पेड़ लगवाए। परिवार नियोजन की प्रेरणा दे। फिर अगर टाइम मिल जाए तो बच्चों को पढ़ा भी दे।
दरअसल हमारे तंत्र में बिजली, पानी, चिकित्सा, पुलिस आदि महकमों की सेवाएँ तो आवश्यक सेवाओं की श्रेणी में आती है। शिक्षा इस आवश्यक श्रेणी में शामिल नहीं है। शायद यह अनावश्यक श्रेणी की सेवा होगी। जितनी अनावश्यक सेवा उतने ही अनावश्यक उस सेवा को देने वाले सेवक। शायद इसीलिए शिक्षक आज भी अपने वजूद की तलाश में है। ट्रांसफर को ही लीजिए। यह शिक्षक के जीवन का सर्वाधिक संवेदनशील पहलू है। लेकिन इसमें पंच, सरपंच, विधायक, सांसद सभी की चलेगी बस सिर्फ शिक्षक की ही नहीं चलेगी।
वजूद की बात पर मुझे एक मजेदार चुटकुला याद आया। पता नहीं किसने बनाया। लेकिन है जोरदार। एक बार एक राजा ने यह शर्त रखी कि मेरे हाथी के कान में एक बात कहकर कोई उसे हँसा देगा तो उसे इनाम मिलेगा। दूसरी बात कहकर गंभीर कर देने पर दुगुना इनाम मिलेगा और तीसरी बात कहकर रुला देने मुँह मांगा इनाम दिया जाएगा। कई लोगों ने प्रयास किए लेकिन हाथी न तो हँसा, ना गम्भीर हुआ और न ही रोया। अन्त में एक आदमी ने तीनों कार्य कर दिखाए। राजा ने कहा-''तू मुँह माँगे इनाम का हकदार तो है लेकिन यह बता कि तूने यह सब कर दिखाने के लिए इसके कान में क्या-क्या कहा? उस आदमी ने जवाब दिया कि सबसे पहले तो मैंने इसके कान में कहा कि मैं आज के दौर में भी ऐश-ओ-आराम से जीना चाहता हूँ। हाथी ने सोचा कि ये कितना बेवकूफ है लोगों को खाने के लिए रोटियाँ नहीं मिल रही हैं और यह मूर्ख ऐसे में ऐश-ओ-आराम की सोच रहा है! तो हाथी मेरी बेवकूफी पर हँस दिया। सीरियस इसलिए हुआ कि मैंने उसे दूसरी बात कही कि मैं एक स्कूल में टीचर हूँ। हाथी चिन्तित हुआ। स्कूल टीचर और ऐशओ आराम? कैसे संभव है? इसीलिए वह सीरियस हो गया। अन्तत: जब मैंने उसे बताया कि मैं टीचर भी प्राइमरी स्कूल का हूँ और इस समय अपना ट्रांसफर करवाने की जुगाड़ में हूँ तो मेरी बात सुनने के बाद मेरी दशा देखकर वह रो पड़ा।

सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)

सुरेन्द्र दुबे (जयपुर) की पुस्तक
'डिफरेंट स्ट्रोक'
में प्रकाशित व्यंग्य लेख

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