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Saturday, November 21, 2015

यूथ की गाँधीगिरी; सर्च से रिसर्च तक

यूथ की लाइफ स्टाइल में गांधीजी के जीवन मूल्यों की झलक दिखाने की जोर-शोर से हो रही चर्चा सुनकर मैं अक्सर टेंशन में आ जाता हूँ। सोचने लगता हूँ कि आखिर गड़बड़ कहाँ हो गई है। गाँधी जी के जीवन मूल्यों में या फिर यूथ की लाइफ स्टाइल में?
मेरे साथ कोई सर्किट तो रहता नहीं जो पता लगाकर बताए। इसलिए मैंने खुद ही सोचना शुरु कर दिया। सोचते-सोचते जब मैं किसी भी नतीजे पर नहीं पहुँचा तो मेरे 'माइन्ड' में 'केमिकल लोचा' हो गया।
जो चीज होती ही नहीं है, उसके होने का बोध करने के लिए हमारे यहाँ रिसर्च की जाती है। इसलिए सर्च करने पर भी जब मुझे यूथ की लाइफ स्टाइल में गाँधी जी के जीवन मूल्यों के दर्शन नहीं हुए तो मैंने इस पर रिसर्च शुरु कर दी। शोध करते ही मुझे यह बोध हो गया कि हमारा आज का यूथ गाँधी जी के जीवन मूल्यों का साक्षात 'पाकेट बुक एडीशन' है। अर्थात् अच्छा-सच्चा संक्षिप्त और सारगर्भित गाँधीवादी।
गाँधी जी ने 'देश की आजादी' की लड़ाई लड़ी और हमारा आज का यूथ 'खुद की आजादी' की लड़ाई लड़ रहा है। आजादी के प्रति उसकी ललक ठीक गाँधी जी जैसी ही है। इसलिए भले ही पूरी तरह से ना सही लेकिन खुद के अनुकूल मामलों में तो वह संक्षिप्त गाँधीवादी ही है।
अहिंसा में आज के यूथ की अटूट आस्था है। इसलिए वे ज्यादातर बातें मोबाइल फोन पर ही करना पसंद करते हैं। वह तुनक मिजाजी जो वे मोबाइल फोन पर बतियाते हुए करते हैं अगर आमने-सामने करने लगें तो हिंसा की सम्भावना बढ़ जाएगी। कितनी खूबसूरती से एडजस्ट किया है आज के यूथ ने अहिंसा को अपनी लाइफ स्टाइल में।
मोबाइल फोन पर जब वह किसी दूसरे को मिसकॉल देता है, तो उसे कड़का या कंजूस समझना सरासर गलत है। मिसकॉल के जरिये वह शरारत नहीं अपितु सत्याग्रह करता है। मिसकॉल यानी सामने वाले को एक अत्यन्त विनम्र आग्रह कि सत्य को जानने के लिए मुझे कॉल बैक करो। सत्याग्रह गांधी जी की तकनीक थी और मिस कॉल, गाँधीजी की उस तकनीक को अपनाने के निमित्त हमारे यूथ की मौलिक तकनीक।
गाँधी जी के ड्रेस-सेन्स की खासियत यह थी कि वे यथासम्भव कम से कम कपड़े पहनते थे। हमारा आज का यूथ भी अपने बदन पर ज्यादा कपड़े लादना पसन्द नहीं करता। वह गाँधी जी के ड्रेस-सेन्स का मर्म समझता है, इसलिए कम से कम कपड़ों में काम चलाना अपना धर्म समझता है।
गाँधी जी जीवन विज्ञान को अधिक महत्व देते थे, किताबी ज्ञान को नहीं। उनके इस विचार को स्वीकार करने की वज़ह से वह किताबों को ज्यादा कष्ट नहीं देता, जीवन की अन्य समस्याओं के समाधान के लिए सतत अनुसंधानशील रहता है। अपनी आत्मकथा में गाँधी जी ने अपनी हैंडराइटिंग $खराब होने पर अफसोस व्यक्त किया था। हैंडराइटिंग तो हमारे आज के यूथ की भी अच्छी नहीं है। गाँधी जैसी ही है। लेकिन उस पर अफसोस व्यक्त करने का वक्त और अवसर उसके पास नहीं है।
विभिन्न आन्दोलनों का संचालन एवं नेतृत्व करना गाँधी जी की महानता का परिचायक है। हमारे यूथ ने गाँधी जी की इस खूबी को तगड़े ढंग से ग्रहण किया है। इसलिए वह एडमीशन से लेकर एग्जामिनेशन तक आन्दोलित ही रहता है। अपनी माँगों को लेकर वह तब तक धरना देता है जब तक कि पुलिस उसे उठाकर थाने में धर ना दे।
हाँ, एक बात वह गाँधी जी की नहीं भी मानता। वह यह कि कोई अगर तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल भी आगे कर दो। यहाँ उसका गाँधी जी से क्लीयरकट मतभेद है। वह साफ कहता है कि-
जो तौ कू काँटा बोए, ताइ बोव तू भाला।
वह भी याद रखेगा भइया पड़ा किसी से पाला॥

-सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


सुरेन्द्र दुबे (जयपुर) की पुस्तक
'डिफरेंट स्ट्रोक'
में प्रकाशित व्यंग्य लेख

सम्पर्क : 0141-2757575
मोबाइल : 98290-70330
ईमेल : kavidube@gmail.com

Friday, November 20, 2015

महिला दिवस बनाम पुरुष रात्रि

रेल बजट प्रस्तुत करते हुए रेलमंत्री ने कॉलेज में पढने वाली लड़कियों को मुफ्त रेल यात्रा का तोहफा दिया। लड़कियोंं को तो सभी तोहफा देते हैं। यही तोहफा लड़कों को भी मिलना चाहिए। लेकिन महिला सशक्तिकरण तभी तो होगा जब लड़कियों को रेलवे का फ्री पास मिलेगा और लड़कों को किराया देना पड़ेगा। इससे मैं यह समझ पाया कि हमारे यहाँ महिला सशक्तिकरण पुरुष अशक्तिकरण पर निर्भर करता है।
महिला सशक्तिकरण की सरकारी योजनाओं का रिजल्ट यह आया कि मेरे घर में पुरुष निशक्तिकरण का अभियान शुरू हो गया। अपनी ही पत्नी के सामने अब मेरी हालत ठीक वैसी है जैसी कि शेरनी के पिंजरे में बांध दिए गए बकरे की होती है। वह अक्सर मुझे कह देती है कि आप में तो अक्ल नहीं है और मैं सिर झुकाकर कहता हूँ-सही बात है। वैसे ही घर-गिरहस्ती के मामलों मेें महिलाएँ ज्यादा होशियार होती है तथा पुरुष एकदम फिसड्डी। कारण यह है कि घर में घुसते ही पुरुष की हस्ती गिर जाती है, इसलिए घर की व्यवस्था घर गिरहस्ती कही जाती है।
पुरूषों की दुर्दशा पर सोचते-सोचते मुझे नींद आ गई। सपने में मेरी रेलमंत्री से भेंट हुई। मैंने उनसे पूछा कि आपकी सरकार महिलाओं की इतनी हितैषी है तो फिर लोक सभा में महिला आरक्षण का विधेयक क्यों पास नहीं करवा पाई। उन्होंने जवाब दिया देखो इसमेें एक टेक्नीकल अड़चन है। ये बिल पास होने पर लोक सभा और विधान सभाओं की तेंतीस प्रतिशत सीट्स महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएगी। फिर हमें ऐसे ही तेंतीस प्रतिशत सीट्स पुरूषों के लिए भी आरक्षित करनी पड़ेगी। ऐसे में टेक्नीकल प्रॉब्लम ये है कि बची हुई चोंतीस प्रतिशत सीट्स पर जो लोग चुनकर आएंगे, वे क्या कहलाएँगे?
महिला सशक्तिकरण की योजनाओं का सबसे ज्यादा नुकसान मुझे हुआ। क्योंकि मेरी पत्नी जरूरत से ज्यादा सशक्त हो गई। सशक्त होते ही उसका बौद्धिक स्तर पहलवानों के बराबर हो गया। कल ही मुझे उपदेश देते हुए कहने लगी कि ''जब तक आप महाकवि तुलसीदासजी की भाँति पत्नी के प्रति अपने मन में प्यार की भावना नहीं जगाओगे तब तक बड़े कवि नहीं कहलाओगे।'' मैंने कहा कि मैं भी तो पत्नी से खूब प्यार करता हूँ! वह बोली-''खुद की पत्नी से प्यार करो तो जानूँ।''
अपनी कमजोर नस पकड़ में आते देख मैंने भी आक्रामक नीति अपना ली। कहते हैं कि आक्रमण ही सुरक्षा की सर्वश्रेष्ठ तकनीक है। इसलिए मैंने उससे पूछा-''तुम्हेें किसने कहा कि तुलसीदास जी अपनी पत्नी से प्यार करते थे?'' वह बोली-''कौन नहीं जानता कि तुलसीदास जी की पत्नी रूठकर मायके चली गई थी तो वे भी उसको मनाने के लिए पीछे-पीछे चल दिए। पहले तो जान जोखिम डाल कर उफनती हुई नदी को पार किया। रात के अंधेरे में ससुराल पहुँचे तो बालकनी से साँप लटक रहा था। वे उसे रस्सा समझकर उसी के सहारे बालकनी में चढ़ गए। इसे कहते हैं अपनी पत्नी के प्रति सच्चा प्यार।''
मैंने कहा-''री बावली। तुम इस कहानी को ठीक से समझ ही नहीं पाई। वे पत्नी को मनाने नहीं गए होंगे। मना करने गए होंगे। मुझे तो ऐसा लगता है कि उन्होंने साँप को रस्सा समझ कर नहीं, साँप समझकर ही पकड़ा होगा। सोचा होगा कि गुस्साई पत्नी से सामना हो इससे अच्छा है कि उससे पहले साँप ही काट खाए। लेकिन शायद साँप ने भी कह दिया होगा कि मेरे काट खाने से तुम्हारी जान नहीं जाएगी। तुम तो वहीं जाओ। वह ही तुम्हारा दिमाग खाएगी। तब बेचारे तुलसीदास जी क्या करते?''
खैर, महिलाओं के पक्ष में कानूनी प्रावधानों की संख्या इतनी तेजी से बढ़ी जितनी तेजी से तो खुद महिलाओं की संख्या नहीं बढ़ी। आपने राष्ट्रीय महिला आयोग, महिला वर्ष, महिला दिवस के बारे में तो सुना या पढ़ा होगा लेकिन राष्ट्रीय पुरूष आयोग, पुरुष वर्ष, पुरुष दिवस के बारे में कभी कोई चर्चा भी नहीं सुनी होगी। मैं तो सरकार से कहता हूँ कि महिला दिवस की तरह पुरुष का दिवस भले ही मत मनाओ 'पुरुष रात्रि' ही मना लो। लेकिन मेरी बात को सुनने वाला कोई नहीं है क्योंकि लिए समाज के माथे पर कन्या भ्रूणहत्या का कलंक लगा हुआ हो उसमें यह सब तो होना ही है। महिलाओं के लिए आयोग और पुरुषों के लिए अभियोग।
-सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


सुरेन्द्र दुबे (जयपुर) की पुस्तक
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Thursday, November 19, 2015

जाँच रिपोर्ट-तीन

गलती से ही सही लेकिन हमारी सरकार ने एक जोरदार काम किया। उस विमान को बहादुरीपूर्वक बचा लिया, जिसका अपहरण ही नहीं हुआ।
सारी रात हड़कम्प मचा रहा और सुबह यह पता चला कि विमान में अपहरणकर्ताओं का कुछ पता नहीं चला। गलतफहमी में ही अफरातफरी मच गई। बेचारे कमाण्डोज, डॉक्टर्स और फायर ब्रिगेड वाले ही नहीं देश के गृहमंत्री और प्रधानमंत्री तक पूरी रात परेशान रहे।
खैर, मैंने इस समूची घटना की राष्ट्रहित में गम्भीरतापूर्वक जांच करके रिपोर्ट पेश की तो उसे पढ़कर जिस गलतफहमी की वजह से यह घटना घटी उस गलतफहमी तक को गलतफहमी हो गई!
मेरी समूची जांच रिपोर्ट इस प्रकार थी-
देश में कुल मिलाकर ठीक-ठाक हवाई अड्डे तीन- उनमें से भी दो तो बन्द रहते हैं और एक खुलता ही नहीं।
जो हवाई अड्डा खुलता ही नहीं, उस पर हवाई जहाज खड़े तीन- उनमें से भी दो तो खराब और एक उड़ता ही नहीं ।
जो हवाई जहाज उड़ता ही नहीं, उसे नियंत्रित करने वाले कंट्रोल टॉवर तीन- उनमें से भी दो तो फिजूल और एक पर खुद का ही कन्ट्रोल नहीं।
जिस कंट्रोल टॉवर पर खुद का ही कन्ट्रोल नहीं, उस पर तैनात सरकारी अधिकारी भी तीन- उनमें दो तो गायब और एक मिलता ही नहीं।
जो सरकारी अधिकारी मिलता ही नहीं, उसने संदेश भेजे तीन- उनमें से दो तो गलत और एक पहँुचा ही नहीं।
जो संदेश पहँुचा ही नहीं, उसे रिसीव करने वाले पायलट भी तीन- उनमें से भी भी दो तो बहरे और एक सुनता ही नहीं।
 जो पायलट सुनता ही नहीं, उसे दिखे अपहरणकर्ता तीन-  उनमें से भी दो तो अदृश्य और एक के शक्ल ही नहीं।
जिस अपहरणकर्ता के शक्ल ही नहीं, उसे पहचानने वाले पेसेंजर भी तीन-उनमें से भी दो तो बेवकूफ और एक के अक्ल ही नहीं।
-सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


सुरेन्द्र दुबे (जयपुर) की पुस्तक
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Wednesday, November 18, 2015

हाल तबीयत का

बीमार दोस्त की तबीयत का हाल पूछने मैं अस्पताल पहुँचा तो पता चला कि अस्पताल तो खुद बीमार पड़ा हैै। अस्पताल का इन्फेक्शन लग जाने मैं बीमार हो गया। मैंने भी सोच लिया कि चाहे जो हो जाए ऐलोपैथी के डाक्टर्स से तो मैं अपना इलाज नहीं ही करवाऊँगा। क्योंकि जिस पैथी में मेडिसिन ही एक्सपायर हो जाती हो उसमें मरीज बेचारा कैसे बचेगा? लिहाजा मैंने घर पर  रहकर अपनी जीवन लीला आयुर्वेद और होम्योपैथी के चिकित्सकों के हवाले कर दी।
अब मेरे घर पर तबीयत का हाल पूछने वालों का ताँता लग गया। सबसे पहले तो 'तबीयत पूछुओं' के कुछ पेशेवर समूह आए। उनके पास तबीयत पूछने के अलावा और कोई काम होता ही नहीं। वे रात-दिन इसी ताक में रहते हैं कि कोई बीमार पड़े तो वे अपना काम शुरू करें। आते ही बताने लगते हैं कि वे कल किसकी तबीयत पूछने गए थे? उसे क्या बीमारी है? वह ठीक हो सकेगा या नहीं। फिर बताने से भी नही चूकते कि मेरी तबीयत पूछने के बाद उन्हें किस-किस की तबीयत पूछने के लिए जाना है। उन्हें यह बताने का शौक होता है कि जिस रोग से मैं पीडि़त हूँ वह रोग पहले किस किसको अपना शिकार बना चुका है। वे सुनना बिल्कुल नहीं चाहते, सिर्फ बोलना चाहते हैं। लम्बे समय तक बैठे रहकर वे बार-बार बताते हैं कि अब उन्हें अमुक आदमी की तबीअत पूछने जाना है। दरअसल वे तबीअत पूछने का ही काम करते हैं। इस काम में वे पूरी तरह बिजी हैं। जिस दिन कोई बीमार नहीं पड़ा पता नहीं वे क्या करेंगे? कहाँ जाएँगे? मुझे तो लगता है कि बेचारे बेरोजगार हो जाएँगे।
मेरी तबीयत पूछने वालों में दूसरा वर्ग उन लोगों का था जिनसे मेैंने पैसा उधार ले रखे हैं। ऐसे सभी लोग वाकई चिन्तित नजर आए। यह पता करना मुश्किल था कि वे मेरे स्वास्थ्य के लिए चिन्तित थे या अपने इन्वेस्टमेन्ट की रक्षा के लिए। लेकिन वे बेहद चिन्तित थे। आये तो वे लोग भी थे जिनमेंं मैं पैसे माँगता हूँ। वे शायद इस बात की तसल्ली करने आए कि पैसे चुकाने ही पड़ेंगे या वैसे ही काम चल जाएगा?
खैर जितने लोग मेरी तबीयत पूछने आए उन सब में एक बड़ी समानता थी। दरअसल वे सब शायद इलाज के  मामले में  डाक्टर्स के भी पितामह थे। सबके सब उसी बीमारी के स्पेशलिस्ट थे जिससे मैं पीडि़त था। दवाओं के इतने विकल्प तो समूचे चिकित्सा जगत को भी नहीं पता होंगे। जो आता वह मुझे नई और अचूक दवा बता जाता। एक बोला-''यह दवा लो, शाम तक ठीक हो जाओगे।'' मैंने कहा ठीक है ले लूँगा। आप ऐसा करना कि वो चिकित्सक जी अभी मुझे देखने आ रहे हैं उसे कह देना कि वह सिर्फ मेरी तबीयत पूछकर चले जाएँ। दरअसल हमारे यहाँ जिसका जो रोल है वह उसे नहीं करना चाहता। हर कोई किसी दूसरे के रोल पर एन्क्रोचमेंट करना चाहता है।
मेरी तबीयत पूछने वालों में कुछ तो इतने खतरनाक शुभचिन्तक थे कि मेरी बीमारी की मारक क्षमता को महिमा मंडित करने लगे। कहते फलां-फलां को यहीं बीमारी हुई थी। ये बीमारी तो आज भी जिन्दा है लेेकिन उनमेेें से कोई भी नहीं बचा जिन्हें ये हुई थी। ऐसे लोगों ने डरा-डरा कर मुझे बीमार पटके रखा। मैं उन सबसे परेशान हो गया। उनकी बातें सुन-सुनकर मुझे एग्जर्सन हो जाता था। लेकिन मैंं भी यह सोचने लगता कि अगर ये मेेरी तबीअत पूछने नहीं आते तो मुझे ज्यादा परेशानी होती यह सोचकर कि मेरे होने का कोई महत्व भी है कि नहीं।
एक दिन बिस्तर पर लेटे-लेटे मुझे उस दोस्त की याद आई जिसकी तबीयत का हाल जानने के लिए मैं अस्पताल गया था और खुद बीमार पड़ गया था। मैंने अस्पताल में फोन करके कहा-फलां वार्ड के बत्तीस नंबर बेड के पेशन्ट से बात कराओ। जवाब मिला कि पेशन्ट तो नहीं है। मैंने पूछा-कहाँ गया है? जवाब मिला-ऑपरेशन थिएटर में। मैेंने पूछा-कब आएगा? जवाब मिला-आएगा या नहीं आएगा या कब आएगा मैं कैसे बता सकता हूँ?
मैंने सोचा कि हम सचमुच बहुत तरक्की कर रहे हैं। पहले कुत्ते की मौत मरते थे, अब अस्पताल की मौत मर रहे हैं। और जो अपने घर पर रहकर इलाज कराएँगे उनमें से कुछ तबीयत पूछने वालों के हत्थे चढ़ जाएंगे।
-सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


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Monday, November 16, 2015

घर-घर में कश्मीर

वैसे प्रॉब्लम और गर्लफ्रेण्ड में कोई खास फर्क नहीं होता। गर्लफ्रेण्ड खुद अपने आप मेें एक प्रॉब्लम होती है जो अपने आप बॉयफ्रेण्ड के गले पड़ी रहती है। प्रॉब्लम भी गर्लफ्रेण्ड की तरह हर पल आपके आस-पास मौजूद रहकर नया टेंशन क्रिएट करती रहती है।
मेरी भी एक गर्लफ्रेण्ड है- मिस अनछुई। उसका अफेयर तो मेरे साथ चला लेकिन शादी किसी और के साथ हो गई। शादी के बाद वे मेरे बराबर वाले मकान में आकर रहने लगे। प्रेम से रहना उसके बस की बात थी नहीं, सो वे आपस में झगड़े बिना रह ही नहीं सकते थे। एक रात चिल्लाने की आवाजें सुनकर मैं अचानक जागा तो पता चला कि वे गाली-गलौच में राष्ट्रीय स्तर की शब्दावली पर उतर आए हैं। मैं इस स्थिति का चुपचाप मजा लेता रहा। मौका दर मौका उनकी गृहस्थी को बाहर से समर्थन भी देता रहा।
मेरे और उनके घर के बीच एक दुबली-पतली अधबनी दीवार है। इस दीवार को बनते और मिटते हुए सभी ने अनेक बार देखा है। पड़ौसियों की राय में वही नियंत्रण रेखा है।
मेरी भलमनसाहत की असलियत जब उसके हजबेण्ड की समझ में आई तो वह बहुत भन्नाया। इसके अलावा वह और कर भी क्या सकता था। पहले तो उसने मुझे चेताया लेकिन जब मैं नहीं माना वह झल्लाया। एक दिन उसने मोहल्ले के जिम्मेदार लोगों के सामने मेरी एक्टीविटीज को 'क्रॉस बॉर्डर टेरेरिज्म' बताया।
एक दिन पति-पत्नी में लड़ाई छिड़ गई। बढ़ते-बढ़ते बात इतनी बढ़ गई कि शोर-शराबे को सुनकर घर के बाहर भीड़ जमा हो गई। पड़ौसियों की मौजूदगी में पति ने पत्नी से कहा कि आज से लड़ाई बन्द कर दो। इसी में हम दोनों की भलाई है। अब मैं तुम्हारी बातों और हरकतों पर रिएक्ट नहीं करुँगा। अगले एक सप्ताह तक अपनी इस घोषणा पर कायम रहूँगा। उस क्राइसिस में ऐसा प्रपोजल देना सचमुच बहादुरी भरा काम था। बाद में पता चला कि कूटनीति की भाषा में यह पति द्वारा किया गया एक तरफा संघर्ष विराम था।
जब उस एक तरफा संघर्ष विराम का कोई खास नतीजा नहीं आया तो पति ने पत्नी से कहा कि बातचीत के लिए टेबल पर आओ। पत्नी बोली कि मैं बातचीत के लिए तब ही टेबल पर आ सकूंगी जब तुम मेरे प्रेमी को भी बातचीत मेें शामिल करो, अर्थात् वार्ता को त्रिपक्षी बनाओ।
बेचारा-बेसहारा पति जो हर कीमत पर अपने घर में शान्ति चाहता था, यह शर्त कैसे मानता? ऐसा लगने लगा कि अचानक दिखाई देने वाला रास्ता दुर्गम पहाड़ी दर्रोंं में कहीं खो गया है। एक खुशहाल मोहल्ले में उसके घर का हाल कश्मीर समस्या जैसा हो गया। ताजा समाचार यह है कि शान्ति की कब्र पर अशान्ति का परचम फहरा रहा है। उनसठ वर्षों में लोग कश्मीर में जाकर घर तो नहीं बना सके हैं लेकिन घर-घर में कश्मीर अब दबे पाँव चला आ रहा है।
-सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


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Saturday, November 14, 2015

बीमारियों का पैकेज दिल

 अमरिकन और यूरोपीयन कम्पनीज से कम से कम एक गुण तो सीखने लायक है। दरअसल वे बीमारी का नाम, इन्वेस्टीगेशन के इन्स्ट्रूमेंट्स और मेडिसिन्स को एक साथ बेचते हैं। बीमारी के नाम से पैकेज डील बनाते हैं। हमारे मंत्रीजी कुछ न कुछ करने की नई-नई बेताबी के साथ विदेश जाते हैं और नई-नई बीमारी का इलाज खरीद लाते हैं, भलेे ही वह बीमारी यहाँ हो ही नहीं।
एक रात सपने मे मैं स्वास्थ्य मंत्री बना तो ऐेसे ही एक नई-नई अंजान बीमारी का इलाज खरीद लाया। आने पर लोगों ने  कहा कि इस बीमारी का नाम तो हमने सुना ही नहीं तो मैंने भी झट कह दिया कि अब अगले कुछ वर्षों तक तुम सिर्फ इसी बीमारी का नाम सुनोगे और तब तक सुनते रहोगे जब तक कि वे हमें बेचने के लिए किसी नई बीमारी और उसके इलाज का एलान नहीं कर देतेे।
वे बेच कर खुश और हम खरीद कर। बीमारियों की इस बीमार खरीद फरोख्त ने विश्व में एक बीमार भाईचारे को जन्म दिया। शामत तो आफिसर्स की आ जाती है। वे उस बीमारी को यहाँ खोजने में जुट जाते हैं। अगर वह बीमारी नहीं भी मिलती तो उससे मिलती-जुलती बीमारी खोज लाते हैं। अगर मिलती जुलती बीमारी भी नहीं मिलती तो फिर वे किसी भी उपलब्ध बीमारी के इलाज में उन उपकरणों और दवाओं को झोंक देते हैं। आखिर बजट का कन्जमशन भी तो आपको लायक सिद्ध करता है।
सबसे बुरी हालत तो डाक्टर्स की है। वे एक बीमारी के इलाज में महारथ हासिल करने की कोशिश कर ही रहे होते है कि  नई आयातित बीमारी उनके गले की फाँस बन जाती है। मुझे तो लगता है कि नई-नई आयातित बीमारियों ने उनकी नजर, दिमाग और रवैये को ही बीमार कर दिया है।
पिछले दिनों मैं एक डाक्टर के पास गया। मैंने अपना परिचय देते हुए उसे बताया कि मैं कवि हूँ। इतना सुनते ही उसने मुझे तपाक से पूछ लिया कि आप कब से कवि हैं? यानी ये बीमारी आपको कब से हैं? मैंने पूछा-क्या मतलब? उसने कहा-यानी आपकी उम्र कितनी है? मैंने जवाब दिया-अड़तालीस साल। बीमारी बहुत पुरानी है। पहले कभी कहीं इसका इलाज करवाया? मैंने जवाब दिया नहीं। उसने कहा-तब तो ये बीमारी लाइलाज हो चुकी है। जाओ और बहरों के मोहल्ले में रहनेे लग जाओ। बस यही इलाज है। ऐसा करने के बावजूद ये बीमारी पूरी तरह ठीक तो नहीं होगी लेकिन और ज्यादा बढ़ेगी भी नहीं।
खैर, उनसे मिलकर लौटते हुए मुझे लगा कि देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए एक काम तो हम कर ही सकते हैं। वह यह कि हम नई-नई बीमारियों की ऐलोपैथी में खोज करके विदेशी कम्पनीज को बेच दें। बाद में वे उसका उपचार ढूँढे। जाँच के उपकरण विकसित करें तथा इलाज के लिए दवा बनाकर सारी दुनिया में बेच दें। उनकी भी कमाई और अपनी भी  कमाई।
यह दिव्य-विचार आते ही मैंने पाँच-सात बीमारियाँ तो आनन-फानन में ढूँढ निकाली। अब उनके अंग्रेजी नाम रखने की देर है। नाम में अगर एंजीटाइटिस, इन्फ्लेमेशन, मीनिया, सिन्ड्रोम जैसे शब्द जोड़ दो तो और भी अच्छा। जो बीमारियाँ मैंने खोजी उनके बारे में बताता हूँ।
सबसे पहली और बड़ी बीमारी है एज्हसटाइटिस। एज्हस का फुलफार्म है- ए जे एच एस यानी अपने आपको ज्यादा होशियार समझना। बीमारी नहीं ये तो महामारी है। हर कोई इसका शिकार है। दूसरी बीमारी है बीसीडी मीनिया। बीसीडी यानी अपनी हैसियत को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना। ये बीमारी महिलाओं में ज्यादा पाई जाती है। तीसरी बीमारी आजकल के युवाओं की  है। बीमारी का नाम है बीएसएच बीएसजेड। यानी बाहर से हीरो भीतर से जीरो।
सभी बीमारियों की खासियत यह होती है कि आप किसी को भी बीमारी के सिमटम्स बताते हैं तो सुनने वाले को लगता है कि यह बीमारी उसको खुद को भी है। आप भी ऐसी बीमारियों पर मेरी तरह रिसर्च करके विदेशी कम्पनियों को बेच दीजिए। फिर देखते हैं कि रुपए के मुकाबले डालर कितनी देर टिकता है?
-सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


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Tuesday, October 27, 2015

विद्यालय में वृक्षारोपण

मानसून तो आया नहीं पर जुलाई का महीना शुरू होते ही सरकारी विद्यालयों में यह आदेश जरूर आ गया कि पेड़ लगाओ। अपने-अपने विद्यालयों में पर्यावरण पखवाड़ा मनाओ। वृक्षारोपण चूंकि हमारा राष्ट्रीय कार्यक्रम है अत: इसे हर कीमत पर सफल बनाना है। इस कार्य में कोताही बरतने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जायेगी, इत्यादि। आदेश मिलते ही ऐसा लगा कि जैसे अचानक शनिचर जी ने अवतार ले लिया हो और वे आदेश का रूप धारण करके पधारे हो।
विद्यालय में 'रेड अलर्ट' हो गया। आनन-फानन में 'स्टाफ मीटिंग' बुलवाई गई। परम्परानुसार सभी अध्यापकों ने सर्वप्रथम मूल आदेश का सावधानी पूर्वक वाचन किया और उसके निचले कोने पर उसी तिथि में अपने संक्षिप्त हस्ताक्षर अंकित कर दिए। जब सारा काम निर्विघ्न रूप से संपन्न हो गया तो चुकी हुई क्षमताओं के धनी प्रधानाध्यापक जी ने स्वयं को किसी 'दिव्य सुरक्षा चक्र' के भीतर पाया।
अब शुरू हुआ आदेश पर सार्थक और गहन विचार विमर्श। एक प्रतिभाशाली अध्यापक ने प्रधानाध्यापक की ओर मुखातिब होकर कहा-''अब तो आपको भी पता चल गया होगा कि पेड़ लगाना हमारा राष्ट्रीय कार्यक्रम है,पढ़ाना नहीं।"
दूसरा अध्यापक बात को आगे बढ़ाते हुए बोला, ''इस आदेश में इस कार्य के निमित्त अतिरिक्त समय देने का निर्देश तो है नहीं, लिहाजा इस पर्यावरण पखवाड़े का सारा काम शाला समय के दौरान ही करना है। ऐसे में पढ़ाई-लिखाई के लिए समय तो बचेगा ही नहीं। इसलिए आदेश पंजिका में  सर्वप्रथम यह आदेश निकाल देना चाहिए कि पर्यावरण पखवाड़े के दौरान समस्त शिक्षण कार्य स्थगित रहेगा।"
तीसरा अध्यापक बोला-''मेरी मानो सबसे पहले अपनी-अपनी 'टीचर्स डायरी' में पूरे पखवाड़े के सभी कालांशों को काटकर सिर्फ एक लाइन लिख दो कि पर्यावरण पखवाड़े से संबंधित सभी कार्यक्रम संपन्न करवाए गए।"
तीनों राष्ट्र निर्माताओं के पावन वचनों को सुनकर प्रधान राष्ट्र-निर्माता की हालत साँप-छछूंदर हो गई। वह बेचारा शान्ति से  'रिटायरमेन्ट' की बाट जोह रहा था कि समानीकरण के तूफान ने अचानक उसे उठाकर प्रधानाध्यापक की कुर्सी पर ला पटका था। नया-नया पद,नया-नया मद, और नया-नया टेंशन; इस बात का कि कहीं खतरे में नहीं पड़ जाये उसकी चिर प्रतिक्षित पेंशन। प्रधानाध्यापक को निरीह मुद्रा में देख पर्यावरण प्रभारी उन्हीं से मुखातिब होकर बोला-''सर! पेड़ तो लगवा देंगे पर इसके लिए पौधे कहाँ से आयेंगे?" इससे पहले कि प्रधानाध्यापक उसके प्रश्न का उत्तर देते, चर्चा को सकारात्मक होते देख शाला प्रभारी ने चर्चा में दखल करतेे हुए पर्यावरण प्रभारी से पूछ लिया- ''आपको पौधे लगवाने के लिए किसने कहा? आदेश तो ठीक से पढिय़े पहले। साफ लिखा है कि पेड़ लगाओ। फिर आप पौधे क्यों लगवाना चाहते हैं? पेड़ और पौधे मेें फर्क समझते हैं आप?" शाला प्रभारी ने पर्यावरण प्रभारी के सवाल के चिथड़े उड़ा दिए।
पर्यावरण प्रभारी ने जवाब दिया, ''पेड़ लगाओ या पौधे लगाओ, एक ही बात है।" जवाब सुनते ही पर्यावरण प्रभारी ने फुफकारते हुए प्रति प्रश्न किया- ''एक ही बात कैसे है? आपको ब्यावर से 'रिलीव" तो विजयनगर के लिए किया है, ऐसे में आप गुलाबपुरा जाकर 'ज्वाइन' कर लेंगे क्या? फिर पूछने पर क्या यह तर्क देंगे कि दोनों में मामूली फर्क है इसलिए इसे एक ही बात समझी जाए।
अपने पर्यावरण प्रभारी को मात खाते देख प्रधानाध्यापक ने मोर्चा संभालते हुए शाला प्रभारी से कहा- ''भाषा पर मत जाओ, भावना को समझने की कोशिश करो।"
प्रधानाध्यापक की सलाह शाला प्रभारी को ऐसी लगी कि जैसे उसे किसी बिच्छु ने डंक मार दिया हो। वह लगभग चीखते हुए बोला, ''अपनी भावनाओं को अपने पास रखो हैड मास्टर साब, यहाँ सबकी नौकरी का सवाल है। जैसा आदेश है, वैसा करो। आदेश कहता है कि पेड़ लगाने है पेड़ लगाओ, पौधे लगाने है तो पौधे लगाओ, बीज लगाने है तो बीज लगाओ पर अपना सड़ा हुआ दिमाग मत लगाओ।" शाला प्रभारी की वाणी में, सिर्फ दो दिन की वरिष्ठता कम होने के कारण प्रधानाध्यापक न बन पाने की वेदना क्रोध बनकर फूट पड़ी थी।
जब प्रधानाध्यापक ने यह दलील दी कि- ''अपना विवेक भी तो काम में लो" तब एक मसखरे अध्यापक ने तुरन्त यह टिप्पणी जड़ दी कि ''आपका तो विवेक लगभग खत्म हो चुका है सर, इसीलिए तो सरकार सिर्फ दो माह के बाद आपको 'रिटायर' करने वाली है।"
शाला प्रभारी ने चर्चा में हावी होते हुए तर्क दिया कि ''सीधी सी बात आपकी समझ में नहीं आ रही है। विभाग ने अगर आपको 'टेबल' खरीदने का बजट दिया है तो आप टेबल की जगह 'स्टूल' खरीद सकते हैं क्या? 'फिजीकल वेरीफिकेशन' में आप 'स्टूल' को 'टेबल' साबित कर सकते हैं क्या? जब ऐसा होना संभव नहीं है तब पेड़ की जगह पौधे कैसे लगाए जा सकते हैं?" शाला प्रभारी का तर्क सुनकर प्रधानाध्यापक और पर्यावरण प्रभारी दोनों एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। दोनों की खामोशी का लाभ उठाते हुए वही मसखरा अध्यापक बोला, ''इसमें लिखा है सर कि पेड़ लगाओ, लगा देंगे। पर इतने बड़े पेड़ को आप खुद हिलाकर तो दिखाओ। जिस पेड़ का आप खुद तो हिला तक नहीं पाएँ, और आप हमसे उम्मीद कर रहे हैं कि हम उसे उखाड़े और विद्यालय परिसर में लाकर लगाएँ। यह कैसे हो सकता है?"
खैर, हुआ यों कि बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंँचे 'स्टाफ मीटिंग' के प्राण पखेरू उड़ गए। पर्यावरण पखवाड़े के दौरान क्या-क्या गतिविधियाँ हुई किसी को कुछ पता नहीं पर शिक्षण कार्य अवश्य स्थगित रहा। अनुपालना की दैनिक सूचना प्रतिदिन मुस्तैदी से तैयार करके भेजी जाती रही। आखिरी दिन प्रभात फेरी निकाली गई जो पूरी तरह पर्यावरण को समर्पित थी। एक पेड़ को काटकर ठेले पर लादा गया। प्रभात-फेरी में बीचों-बीच उसे सजाकर पूरे गांव में यह संदेश देने के लिए घुमाया गया कि इस तरह के पेड़ लगाने हैं। प्रत्येक छात्र के दोनों हाथों में उस पेड़ की एक-एक टहनी थी। किसी को पता नहीं कि पर्यावरण पखवाड़े के दौरान क्या  काम हुआ? पर यह सभी ने देखा कि एक निर्दोष पेड़ का काम तमाम हुआ।
-सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


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Saturday, October 24, 2015

हँसते-हँसाते पानी बचाओ

पानी बचाने की जागरूकता के लिए चलाए गए अभियान अब खुद पानी माँगने लगे हैं। इस मुद्दे पर पहले भी कई पानीदार सरकारों का पानी उतर चुका है। कितने ही एन.जी.ओ. पानी-पानी होकर रह गए। लेकिन ये जागरूकता है कि लोगों के बीच आने को तैयार ही नहीं है।
इस चुनौती भरे काम को करने के लिए मैंने रिसर्च की। मेरी रिसर्च ये है कि हम अपनी लाइफ स्टाइल में रोचक बदलाव लाकर हँसने-हँसाने का आनन्द भी उठा सकते हैंं और पानी भी बचा सकते हैं। इसके लिए मैंने कई 'स्किल्स' इजाद की है। हमें उन 'स्किल्स' को अपनाना होगा। हँसते-हँसाते पानी बचाना होगा। वरना वैज्ञानिक तो पहले से ही चेतावनी दे चुके है कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा। वह भी तब जबकि धरती के दो तिहाई भाग पर पानी ही पानी है। मेरी इस अतिमहत्वपूर्ण रिसर्च की समरी इस प्र्रकार है।
टेक्नीक नम्बर वन-पानी बचाने का सर्वाधिक आसान और रोचक तरीका यह है कि सब लोग अपने-अपने बाल कटवाकर गंजे हो जाओ। बालों मेंं साबुन रह जाता है। ऐसे में नहाते समय बाल धोने में पानी ज्यादा बर्बाद होता है। औरतों के बाल तो और भी ज्यादा लम्बे होते हैं। इसलिए दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध से बचाने के लिए उन्हें भी गंजा हो ही जाना चाहिए। फिर हमेें एक दूसरे को देखने में कितना मजा आएगा। चारों ओर टकले ही टकले दिखाई देंगे। टकलियों को अलग से पहचानना मुश्किल होगा इससे जेेन्डर से जुड़ा भेदभाव भी समाप्त होगा। इसे कहते हैं एक पंथ दो काज।
मेरी यह रिसर्च पता नहीं कैसे लीक होकर एन.जी.ओ. के एक एक्टीविस्ट तक पहुँच गई। उसने इसे तुरंत लपक लिया। सबसे पहले तो उसने खुद के सिर के बाल कटवाए। और अब जेब में उस्तरा लिए डोल रहा है ताकि लोगों को गंजा करके पानी बचाने की प्रेरणा दे सके। सुना है कि  उसने कई स्वयं सेवी हेयरड्रेसर्स का संगठन बनाकर पानी बचाने का एक प्रोजेक्ट भी समिट कर दिया है। आशा है कि सरकार उस प्रोजेक्ट को जल्दी ही हरी झण्डी दे देगी। चुनावी वर्ष में सारे काम फटाफट होने हैं।
टेक्नीक नम्बर टू-जब हम फुल स्लीव की शर्ट पहनते हैं तो उसे धोते समय कोहनी से कलाई तक की आस्तीन को धोने में पानी की फिजूल खर्ची होती है। इसे रोकने के लिए हमें हाफ स्लीव की शर्ट पहननी चाहिए। हम जेन्डर का भेद भाव किए बिना सोचें। चाहे तो स्लीव लेस शर्ट पहनें। चाहे तो विश्व हित में शर्ट न भी पहने। केवल बनियान से काम चलाए पानी तो बचेगा ही । सोचिए कितना आनन्ददायक दृश्य उपस्थित होगा। जिसकी कल्पना मात्र से ही आनन्द आ रहा है उसे साकार होते देखने में सचमुच सबको कितनी हँसी आएगी। हम एक-दूसरे को देखकर हँसेंगे और सब हमें देखकर। आपको कम कपड़े में जो लड़के-लड़की नजर आ रहे हैं वे फैशन के कारण ऐसा नहीं कर रहे हैं। दरअसल वे पानी बचाने के लिए मेरी रिसर्च अपना रहे हैं।
टेक्नीक नम्बर थ्री- हमारी रोज नहाने की आदत ठीक नहीं है। इससे पानी बर्बाद होता है। पानी बचाने के लिए स्नान सिर्फ साप्ताहिक हो। चाहें तो पति-पत्नी एक साथ नहाएँ। इससे पानी भी बचेगा तथा उनके पारस्परिक संबंध भी सुधरेंगे।
इस क्रान्तिकारी रिसर्च को सुनते ही मेरे एक दोस्त के भीतर भी एक आइडिया कुलबुलाने लगा। उसने कहा कि हम टायलेट में फ्लश का बटन दबाते हैं तो फ्लश के डिब्बे में भरा तीन-चार लीटर एक साथ बह जाता है। अगर हम उस डिब्बे में मिनरल वाटर की एक बोतल डाल देें तो एक लीटर पानी कम भरेगा। डिब्बे में एक लीटर पानी कम भरा तो बटन दबाने पर एक लीटर पानी कम बहेगा। मान लो दिन भर में हम दस बार फ्लश का बटन दबाते हैं तो बचा कि नहीं दस लीटर पानी?
दोस्त ने बेहतरीन आइडिया दिया लेकिन वह आइडिया था, इसलिए मैंने नहीं लिया। यहाँ आइडिए की क्या वेल्यू? वेलेबल तो रिसर्च होती है। आइडिया तो ऐसे होता है जैसे कि सड़क पर घूमता हुआ नंगा आदमी। रिसर्च उस रईस की तरह होती है जो जून की दोपहर में भी सूट पहनकर निकलता है। तभी से मैं अपने हर आइडिए को रिसर्च कहता हूँ।
खैर, मैंने उस आइडियाबाज को यह कहकर चुप कर दिया कि पहले पानी तो हो जिसे बचाया जाए। समस्या ये है कि जब पानी ही नहीं है तो हम किसे बचाएं। अपना आइडिया अपने पास रखो। अपनी रिसर्च जीवित रहे इसलिए मैंने उसके आइडिए की हत्या कर दी। यहाँ आदमी के मरने पर भी कोई नहीं रोता तो किसी आइडिए के मरने पर कौन आँसू बहाए? हम पानी बचाने की बात उन लोगों को कहते हैं जिनके पास अपनी जरूरत से कम पानी है। जिनके पास जरूरत से ज्यादा पानी है उन्हें अगर पानी बचाने की बात बताते तो जागरूकता का ये मिशन कभी का कामयाब हो जाता।
-सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


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Thursday, October 22, 2015

मैरीज का मास्टर प्लान

आदमी अपने पुरुषार्थ के बूते पर प्रधानमंत्री तो बन सकता है लेकिन इससे उसकी शादी भी हो जाए, यह जरूरी नहीं है। जिन्दगी के इस डिपार्टमेंट में पुरुषार्थ का रोल कम और प्रारब्ध का ज्यादा होता है।
नौकरी नहीं मिलने की वजह से मेरी शादी का प्रोजेक्ट पूरी तरह से खटाई में पड़ चुका था। मैं मन ही मन बहुत परेशान था। मुझसे भी ज्यादा परेशान थे मेरे मोहल्ले वाले। रिश्तेदार आशंकित और पड़ौसी आतंकित। कुल मिलाकर मेरा कुँवारापन एक विकराल समस्या बनकर उभर रहा था।
मैं मार्केटिंग का विशेषज्ञ था इसलिए मुझे अपने पुरुषार्थ पर कुछ ज्यादा ही भरोसा था। कैसी भी परिस्थिति में मैं हिम्मत हारने वाला नहीं था। अत: मैंने समाज के सभी वर्गोंं के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए अपनी मैरीज का मास्टर प्लान बनाया।
सबसे पहले मैंने अखबार में विज्ञापन छपवाने की सोची। लेकिन यह फैसला मैंने पहले ही ले लिया था कि अखबार में विज्ञापन तो देंगे क्लासीफाइड में नहीं देंगे क्योंकि विवाह योग्य युवतियों के बुढ़ाते हुए पेरेन्ट्स क्लासीफाइड के बारीक अक्षरों को ठीक से नहीं पढ़ सके तो सारा गुड़ गोबर हो जाएगा। इसलिए फोटो सहित अलग से विज्ञापन छपना चाहिए ताकि सबकी नजर पड़े। विज्ञापन का मैटर भी मैंने पूरा दिमाग लगाकर बनाया। लिखा कि ''विवाह की इच्छुक युवतियाँ नि:संकोच अपना बायोडेटा भेजे बिल्कुल नहीं डरे। विवाह योग्य वर-कवि सुरेन्द्र दुबे। पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें।''
अखबार के दफ्तार में अपना यह विज्ञापन सौंपते हुए मैंने टेबल पर पड़े अखबार को बड़ी हसरत से निहारा। बकायदा उसे अपने सिर से लगाकर कहा-''एक तेरा सहारा।'' अब मैं पूरी तरह निश्चित था। मैंने सोचा कि विवाह योग्य लड़कियों के पेरेन्ट्स को नींद तो आती नहीं। कल सुबह पाँच बजे अखबार में विज्ञापन देखते ही सात बजे तक तो मेरे घर आ जाएँगे। कल से अपना भाग्य बदलने वाला है यह सोचकर मैं सो गया। लेकिन मेरी तकदीर ही खराब थी। इस बार संपादक ने गलती कर दी। वैवाहिक विज्ञापनों के पन्ने पर छापने की बजाय उसने गलती से मेरा विज्ञापन शोक समाचार वाले पेज पर छाप दिया।
शोक समाचार वाले पेज छपने वाले विज्ञापनों को कोई भी ध्यान से नहीं पढ़ता। सिर्फ फोटो देखते ही समझ जाता है कि इसका विकेट उड़ चुका है। लिहाजा लड़कियों के पेरेन्टस तो आए लेकिन सुबह-सुबह मेरे घर के बाहर शवयात्रा में शामिल होने वाले लोगों का जमघट लग गया।
लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। मैंने तुरंत एक मैरीज ब्यूरो खोल लिया। अपने आफिस पर बड़ा सा बोर्ड टाँगकर उस पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखवाया-''दुल्हन वही जो दुबेजी दिलाए।'' चार दिन बाद बगल में दूसरा आफिस खुल गया जिसके बोर्ड पर लिखा था-''तलाक वही जो चौबे जी कराए।''
चौबे ने सोचा कि दुबे जो खुद शादी नहीं कर सका, जरुर दूसरों के ऊटपटांग रिश्ते करवाएगा। ऐसे में इसका हर कस्टमर छ: महीने बाद रोता हुआ मेरे पास आएगा। उसे सफलता के लिए अपनी योग्यता की तुलना में मेरी अयोग्यता पर ज्यादा भरोसा था। दोनों की कोशिशें अलग-अलग तरह की थी। मैं बंधन बेच रहा था और वह मुक्ति। सामाजिक सरोकारों से शून्य लोगों की मजबूरी है कि कभी मेरे पास आए और कभी उसके पास जाए। लेकिन हम दोनों के मनों में पता नहीं कौनसा डर है कि दोनों की नजर में एक-दूसरे का कस्टमर है।
-सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


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Wednesday, October 21, 2015

अवेयरनेस में अफेयरनेस

एड्स के प्रति अवेयरनेस के लिए कार्यक्रम प्रस्तुत करते हुए हॉलीवुड स्टार रिचर्ड गेर और बॉलीवुड की स्टारनी शिल्पा शेट्टी दिलवालोंं की दिल्ली में अचानक दिल्लगी करने लगे। आए तो वे अवेयरनेस के निमित्त थे लेकिन शो के दौरान आपस में अफेयरनेस कर बैठे।
'सीना तान के उत्सव' नामक इस कार्यक्रम में ज्यों ही शिल्पा ने सीना ताना, बिना देर किए रिचर्ड गेर ने ऐसा हेर-फेर किया कि बेचारी शिल्पा ढेर होते-होते बची। उसने सरे आम 'मिस' को 'किस' किया और दर्शकों ने किस को मिस किया। खलबली मचनी थी,मची। वे सोचने लगे कि अपनों के रहते ये गैर कहाँ से आ टपका। टपका सो तो टपका वह बिग ब्रदर की स्वीट सिस्टर पर सरे आम इस तरह क्यों लपका? लिहाजा उन्हें संस्कृति की रक्षा के लिए सड़कों पर आना पड़ा। बहुत दिनों से सुस्त पड़े संस्कृति सेवियों को काम मिल गया। क्रिया दिल्ली में हुई और प्रतिक्रिया मुम्बई समेत अनेक शहरों में। संस्कृति सेवियों ने दोनों के पुतले फूँक कर 'कार्यक्रम' का 'क्रियाकर्म' कर दिया।
रिचर्ड पर चर्ड-चर्ड करता हुआ संस्कृति सेवी मेरे पास आया। मैंनें उससे उसकी इस ताजा भन्नाहट का कारण पूछा तो उसने बताया कि भारतीय संस्कृति का अपमान उसे बहुत बुरा लग रहा है। मैंने पूछा ''जब खुद शिल्पा को ही बुरा नहीं लग रहा है तो तुम क्यों फिजूल में परेशान हो?'' बोला-''उसे क्यों बुरा लगेगा? वह कोई भारतीय नारी की प्रतीक थोड़े ही है।'' मैंने कहा-''जब शिल्पा भारतीय नारी की प्रतीक है ही नहीं तब उसकी किसी भी ऊल-जलूल हरकत से भारतीय संस्कृति का अपमान कैसे हो सकता है?''
उसने समझाया-''भारतीय संस्कृति पर इसका बुरा प्रभाव पडऩा तय है। हमारे टीवी चैनल्स को जब कभी कोई 'हॉट सीन'  मिल जाता है तब उन्हें ऐसा लगता है कि जैसे बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा हो। वे उस सीन को लगातार दिखाते ही रहते हैें। इधर हमारे नासमझ बच्चे दिन-रात टीवी से चिपके रहते हैं। अब आप ही बताओ उसे देखकर बच्चे बिगडेंगे कि नहीं? बच्चे बिगड़ गए तो संस्कृति कैसे बचेगी?''
मैंने उसके प्रश्न के उत्तर में प्रश्न ठोक दिया और पूछा-''बच्चों के बिगडऩे-सुधरने की स्टेज तो बाद में आएगी। आप पहले यह क्यों नहीं सोचते कि एड्स के प्रति जागरुक न होने पर हमारे बच्चे बचेंगे कि नहीं?'' वह बोला-''जो भी हो मुझे तो बहुत बुरा लग रहा है।'' मैंने कहा-''दोस्त! अच्छा तो मुझे भी नहीं लग रहा है। लेकिन जिस जागरुकता का विषय ही सैक्स हो उसमें 'किस' से कम क्या किया जा सकता है? भारतीय संस्कृति के दायरे में रहते हुए एड्स के प्रति जागरुकता पैदा करने का क्या तरीका हो सकता है?''
मेरे सवाल का जवाब शायद उसके पास नहीं था, इसलिए वह मुझे बुरा-भला कहता हुआ किसी दूसरे शिकार की तलाश में चल दिया।
 -सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


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Tuesday, October 20, 2015

क्षण भंगुर देह, अति क्षणभंगुर

सचमुच कितनी भोली-भाली और सीधी-सादी लड़की है-उस नई फिल्म की नई नवेली नायिका। बेचारी कुछ भी तो नहीं छिपाती। इतनी सीधी-सच्ची और अच्छी लड़की के बारे में लोग पता नहीं क्यों कैसी-कैसी बातें करते रहते हैं? देह प्रदर्शन को लेकर, सपने में राखी से खुलकर बातें हुई। प्रस्तुत है उस बातचीत के प्रमुख अंश-
प्रश्न- आप पर आरोप है कि आप अंग प्रदर्शन के सहारे शोहरत की सीढिय़ाँ चढ़ रही है?
उत्तर- अंग तो शरीर के हिस्से हैं और शरीर नश्वर है। अब इसेे क्या तो छिपाना और क्या दिखाना? मैं ऐसी बातों पर ध्यान नहीं देती। मेरी नजर में शरीर का कोई महत्व नहीं है। महत्व सिर्फ आत्मा का है। आप भी इस तरह से क्यों नहीं सोचते?
प्रश्न- लेकिन इतने कम कपड़े पहनना तो अश्लीलता के दायरे में आता है। आप अपने ड्रेस सेंस के बारे में क्या कहेंगी?
उत्तर- बड़े-बड़े अनेक महापुरूष ऐेसे हुए हैं जिन्होंने कपड़ों को बिल्कुल महत्व नहीं दिया। मैं भी बड़ा बनना चाहती हूँ तो क्या गलत करती हूँ।
प्रश्न- लेकिन शर्मीली लड़कियों की तरह आप शालीन ड्रेस क्यों नहीं पहनती?
उत्तर- आप समझे नहीं। आपका दिमाग अभी भी शरीर पर अटका हुआ है। जन्म से पहले और मृत्यु के बाद इस बेचारे शरीर का अस्तित्व ही नहीं रहता। ये बेचारा, कुछ समय के लिए है। फिर इस पर ज्यादा कपड़े क्यों लादे? जब शरीर साथ नहीं जाएगा तो उस पर लादे गए कपड़े भी तो यहीं पर रह जाएँगे कि नहीं? क्षण भंगुर देह के अति-क्षण भंगुर परिधान को इतना महत्व देकर आप तो परेशान हैं ही, मुझे क्यों परेशानी में डालना चाह रहे हैं?
प्रश्न- लेकिन लोगों को इस पर बहुत ऐतराज है।
उत्तर- मुझे तो लोगों के अधिक कपड़े पहनने पर बिल्कुल ऐतराज नहीं है। जिन्हेंं मेरे कम कपड़ों पर ऐतराज है वे पहन लें मेरे हिस्से के अधिक कपड़े। अगर मैं ज्यादा कपड़े पहनने लगी तो मेरे प्रशंसकों के प्रति मेरी ओर से भावनात्मक हिंसा होगी जिसे मैं कभी भी स्वीकार नहीं कर सकती।
प्रश्न- आप अपने प्रशंसकों के बारे में क्या कहेंगी?
उत्तर- बड़े बहादुर लोग हैं वे। लाखों की भीड़ में जान हथेली पर रखकर आते हैं। लाठीचार्ज भी हो सकता है। गोली भी चल सकती हैं लेकिन वे इसकी परवाह न करते हुए मेरा डांस देखने आते हैं। मुझे उनकी भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए सो मैं रखती हूँ। मैं ऐसा नहीं करूँगी तो वे भी हिंसक हो सकते हैं। जिसे आप बार-बार देह प्रदर्शन कह रहे हैं वह तो मेरी अहिंसा के प्रति आस्था है जिसका उद्देश्य ही परोपकार है।
प्रश्न- एक तरफ तो आप अहिंसा की बात करती हैं और दूसरी तरफ आपके शो में लाठीचार्ज होता है। बेचारे दर्शक लहुलुहान हो जाते हैं। इस पर आपका क्या कहना है?
उत्तर- जो हुआ अच्छा हुआ। जो हो रहा है अच्छा ही है। आगे जो होगा वह भी अच्छा ही होगा। सबका अपना-अपना प्रारब्ध है। मैं इसमें क्या कर सकती हूँ? लाठियाँ खाकर मेरे प्रशंसकों को उतनी तकलीफ नहीं होगी जितनी तकलीफ मुझे ज्यादा कपड़ों में देखकर होगी।
प्रश्न- सुना है कि विद्वानों की संगति में रहकर आपका आध्यात्म की तरफ रुझान बढ़ रहा है?
उत्तर- हाँ, मैं विद्वानों की बातों को आचरण में ढालने की कोशिश करती हूँ। इसीलिए तो व्यवहार, ज्ञान, आचरण देह सभी को आवरण से मुक्त रखने की कोशिश करती हूँ।
प्रश्न- लेकिन आपके तर्क मेरे गले क्यों नहीं उतर पा रहे हैं?
उत्तर- गले में उतारने हैं तो गले को साफ करो उतर जाएँगे। लेकिन दिमाग में समझने हों तो किसी कवि की ये पंक्तियाँ सुन लो। सारी बात समझ में आ जाएगी।
यह न प्रकाशित हो पाएगी, खबर किसी अखबार में।
सारी नर्तकी नाची, अंधों के दरबार में।।

 -सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


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Monday, October 19, 2015

सस्ती हवाई यात्रा की मस्ती

प्राइवेट एयर लाइन्स ने किराया कम करके हवाई यात्राओं का चरित्र ही बदल दिया है। अब जरूरत नहीं है कि आपके बोर्डिंग कार्ड पर आपको सीट नं. अलॉट किए जाएँ। कई एयर लाइन्स ऐसी भी हैं जो 'पहले आओ-पहले पाओ' की नीति अपना रही हैं। ऐसे में बेचारे पेसेंजर को भागकर विमान में घुसना पड़ता है। पिछले दिनों मुझे भी ऐसा ही करना पड़ा। मैं बैठने के लिए एक खाली सीट की तरफ लपका तो मैंने देखा कि उस सीट पर एक रुमाल बिछा हुआ है। पड़ौस की सीट पर बैठे पेसेंजर ने मुझे बताया कि यह सीट उसने अपने साथी के लिए रोक रखी है। मैं समझ गया कि बस यात्रा की महान परम्पराएँ हवाई यात्रा में आ पहुँची हैं।
खैर, मुझे भी एक सीट मिलनी थी सो मिल गई। हवाई यात्रा के चरित्र में हुए इस बदलाव पर सोचते-सोचते मेरी आँख लग गई। नींद में सपने में मुझे अजीब दृश्य दिखाई दिए। अब मैं अनुमान लगा चुका था कि इस बदलाव का भविष्य क्या है? धीरे-धीरे जब बसों और रेलों में यात्रा करने के अभ्यस्त लोग कम किराए की वजह से हवा में उडऩे लगेंगे तो हवाई यात्रा की संस्कृति कितनी बदल जाएगी? जो दृश्य सपने में मैंने देखे वे आपको दिखा रहा हूँ।
दृश्य-1
टेक ऑफ करने के लिए रनवे पर रेंगते हुए हवाई जहाज को एक पेसेंजर ने हाथ का इशारा करके रोक लिया है। वह हाँफता हुआ विमान में चढ़ कर पायलट से कह रहा कि पाँच मिनट रोकना तीन पेसेंजर और आ रहे हैं। विमान का कप्तान नकद पैसे लेकर उसका टिकट बना रहा है। खुले पैसे न होने के कारण उसने टिकट के कोने पर गोला बनाकर बकाया राशि लिख दी है। उसने पेसेंजर से कह दिया है अभी खुले पैसे नहीं है। उतरो तब याद करके ले लेना। वह बेचारा इस टेंशन में सफर कर रहा है कि उतरते वक्त कहीं मैं बकाया रकम लेना न भूल जाऊँ?
दृश्य-2
बस और ट्रेन की तरह विमान में तीन-चार लोग चढ़ आए हैं उनमें से कोई अकबर-बीरबल के किस्सों की किताब बेच रहा है तो कोई मुसम्मी का ज्यूस निकालने की मशीन। कोई पेन बेच रहा है तेा कोई मल्टीपरपज दंतमंजन। दंतमंजन बेचने वाला दाँत में से हाथों हाथ कीड़े निकालने का दावा कर रहा है। एक पेसेंजर उसके झाँसे में आ गया है। उसने एक दाँत से कीड़ा निकालने की बजाय दाँत ही निकाल दिया है। सचमुच स्काई शॉपिंग का फ्यूचर बड़ा ब्राइट है।
दृश्य-3
पेसेंजर बैठे-बैठे टाइम पास करने के लिए मूंगफली खा-खा कर छिलके गिरा रहे हैं। रेलों की तरह एक लड़का सफाई करने आया है उसे देखकर एक महिला दूसरी महिला से कह रही है कि चप्पल सँभाल कर रख। पिछली बार जब मैं कोलकाता जा रही थी तो मुझे ध्यान ही नहीं रहा और चप्पल गायब हो गई। सफाई करने वाले ने छिलके बुहारने के बाद पेसेंजर्स के सामने पैसे के लिए अपना हाथ फैला दिया है। कोई उससे कह रहा है कि आगे चल, हमने थोड़े ही बुलाया है तुझे?
दृश्य-4
हवाई यात्रा के लिए जाते हुए बेटे को माँ समझा रही है कि उड़ते हवाई जहाज की खिड़की में से हाथ बाहर मत निकालना। अपनी जेब का ध्यान रखना मैंने सुना है कि आजकल हवाई जहाज में जेबकतरे ज्यादा सफर करते हैं। कुछ जेबकतरे तो इतने उस्ताद है कि वे बैंकों और सरकार तक की जेब काट लेते हैं।
दृश्य-5
सफर के दौरान अचानक एक ढफली वाला आ गया है जो पुराने गाने, भजन और कव्वाली सुना रहा है। जो पेसेंजर उसे आगे जाने की कहता है वह उसी के सामने ढफली को उलटकर पैसे की माँग करता है। पेसेंजर भन्ना जाता है लेकिन फिर कुछ छोटे नोट डालकर अपना पिण्ड छुड़ाता है।
तभी मेरी आँख खुल गई। भूख लगी थी तो नाश्ता खरीदना पड़ा। प्राइवेट एयरलाइन्स में नाश्ता खरीदने में मुझे तकलीफ हुई। क्योंकि हवाई यात्रा के दौरान मुफ्त का नाश्ता करने की आदत जो पड़ चुकी थी।
आदमी चाहे जितनी भी तरक्की कर ले मुफ्तखोरी की आदत उससे नहीं छूटती।
-सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


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Saturday, October 17, 2015

क्राइम शो की एंकरिंग

एक दिन किसी दोस्त ने मुझ पर यह सलाहात्मक प्रश्न दाग दिया कि तुम किसी न्यूज चैनल पर क्राइम शो की एकरिंग क्यों नहीं करते? मैंने जवाब दिया कि दोस्त टीवी के प्रोग्राम्स में तो चॉकलेटी चेहरे वाले लड़के-लड़कियाँ एंकरिंग करते हैं। दरअसल मेंरी शक्ल एंकरिंग के लायक नहीं है। मेरा जवाब सुनते ही वह मेरी अवधारणा का खंडन करते हुए बोला-''क्राइम शो की एंकरिंग के लिए तो वे छाँट-छाँट कर बदसूरत वाले चेहरे लाते हैं। तुम तो उसके लिए बिल्कुल फिट हो।'' मैं समझ गया कि जिसके ऐसे दोस्त हों उसे दुश्मनों की क्या जरुरत?
खैर, क्राइम शो का एंकर अपनी कर्कश आवाज और भयानक मुख मुद्रा से डरा-डरा कर आपको अपना प्रोग्राम देखने के लिए मजबूर कर देता है। वह बताता है कि क्यों दिया अमुक औरत ने अपने ही पति को जहर? किसलिए किया उसने अपने सगे भाई का कत्ल? किस डकैती के पीछे निकला घर में काम करने वाली नौकरानी का हाथ? आपका समूचा आत्म विश्वास हिला देने के बाद वह बताता है कि ये सब आप के साथ भी हो सकता है।
किसी भी प्रकार टीवी के प्रोग्राम्स में अपना चेहरा दिखाने की लालसा ने क्राइम शो की एंकरिग के लिए मुझसे जो स्क्रिप्ट लिखवाई जो इस प्रकार है-
चैन से सोना है तो अब जाग जाओ। बीवी को देखो गुस्से में तो बिस्तर छोड़कर भाग जाओ। खबरें तो सिर्फ बहाना है। हमें तो आपको डरा-डरा कर बहादुर बनाना है।
थानेदार के हाथ से होने वाली पिटाई और बीवी के हाथों से होने वाली धुनाई में सिर्फ एक ही फर्क आता है कि थानेदार को तो फिर भी रहम आ जाता है, बीवी को रहम नहीं आता है। बीवी को अपने शोहर पर रहम की जगह सिर्फ वहम आता है। पेश है इस बारे में अहमदाबाद से हमारे क्राइम रिपोर्टर कुमार झँूठा की ये सच्ची रिपोर्ट।
टीवी की स्क्रीन पर हाथ में माइक थामे कुमार झूठा यूं प्रकट होते हैं जैसे कि सत्यवादी हरीश चंंद्र के कलयुगी अवतार सिर्फ वे ही हों। वे सिलसिलेवार बताना शुरू करते हैं-
तीस फरवरी का मनहूस दिन था। (यह बात वही जाने कि यह तिथि किस कलेंडर की शोभा बढाती है) और उसी दिन खेला गया यह खूनी खेल, जिसे देखकर आपके रोंगटें खड़े हो जाएँगे (अगर वे पहले से ही खड़े न हों)।
(अब कुमार अपनी बात को आगे बढाता है-) ये हैं अहमदाबाद के भोला भाई। इनकी पत्नी खूँखार बेन ने ऐसी की इनकी धुनाई कि नाक से खून बह रहा है। चेहरे का हर जख्म कह रहा है कि हमले में बेलनाकार हथियार का जमकर इस्तेमाल हुआ था।
इस बारे में भोला-भाई मूर्छित होने की वजह से कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थे लिहाजा हमने खँूखार बेन से बात की
प्रश्न-क्या आप अपने पति को रोजाना पीटती हैं?
उत्तर-रोजाना टाइम किसे मिलता हैं?
प्रश्न-तो आप अपने पति को कब पीटती हैं?
उत्तर-एक दिन छोड़कर सब दिन पीटती हूँ।
प्रश्न-एक दिन छोड़कर एक दिन किसलिए?
उत्तर-इसलिए कि मारने के बाद पुचकारना भी तो पड़ता है।
प्रश्न-मारती हैं तब पुचकारती क्यों हैं?
उत्तर-पुचकारूँगी नहीं तो ये घर छोड़कर भाग नहीं जाएगा। फिर पिटने के लिए खुद पडौसन का आदमी थोड़े ही आएगा। इस काम के लिए तो खुद का पति ही ठीक रहता है जो अपने आप नियम से आए और पिट ले।
आइये देखते हैं कि इस बारे में प्रसिद्ध मनो चिकित्सक डा. भेजा चाटिया के विचार। डॉ. भेजा चाटिया प्रकट होकर बताते हैं-
आजकल शादी दो आत्माओं का पवित्र मिलन नहीं बल्कि दो आत्माओं की भयानक भिडंत का नाम है। किसी भी बीवी को अपने पति को पीटने शौक नहीं होता (एडिक्शन)आदत होती है। दरसल ये तेजी से फैलता हुआ नया रोग है ''प्मोर्स'' (pmors) जिसका फुल फार्म है-पोस्ट मेरीज ओल्ड रिवेंज सिन्ड्रोम। अभी तक इसका उपचार नहीं खोजा जा सका हैं इसलिए कुछ बातों का ध्यान रखकर सिर्फ अपना बचाव ही किया जा सकता है। जैसे अगर आप टू व्हीलर चलाते हैं हैलमेट पहनकर ही घर में घुसें। फिर घर का माहौल देखकर ही हैलमेट उतारें। और अगर आप कार यूज करते हैं तो पहले से ही आऊटिंग का प्रोग्राम बना लें। खुद घर  में घुसने की बजाय पत्नी को बाहर बुलाएँ। इन छोटी बातों को अपनी आदत बनाकर इस रोग के प्रभावों से बचा जा सकता है।
अभी वक्त है एक ब्रेक का। ब्रेेक के बाद क्राइम रिपार्टर बताने वाला है कि कौन था वह अन्धा चश्मदीद गवाह?

-सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


सुरेन्द्र दुबे (जयपुर) की पुस्तक
'डिफरेंट स्ट्रोक'
में प्रकाशित व्यंग्य लेख

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