Thursday, October 22, 2015

मैरीज का मास्टर प्लान

आदमी अपने पुरुषार्थ के बूते पर प्रधानमंत्री तो बन सकता है लेकिन इससे उसकी शादी भी हो जाए, यह जरूरी नहीं है। जिन्दगी के इस डिपार्टमेंट में पुरुषार्थ का रोल कम और प्रारब्ध का ज्यादा होता है।
नौकरी नहीं मिलने की वजह से मेरी शादी का प्रोजेक्ट पूरी तरह से खटाई में पड़ चुका था। मैं मन ही मन बहुत परेशान था। मुझसे भी ज्यादा परेशान थे मेरे मोहल्ले वाले। रिश्तेदार आशंकित और पड़ौसी आतंकित। कुल मिलाकर मेरा कुँवारापन एक विकराल समस्या बनकर उभर रहा था।
मैं मार्केटिंग का विशेषज्ञ था इसलिए मुझे अपने पुरुषार्थ पर कुछ ज्यादा ही भरोसा था। कैसी भी परिस्थिति में मैं हिम्मत हारने वाला नहीं था। अत: मैंने समाज के सभी वर्गोंं के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए अपनी मैरीज का मास्टर प्लान बनाया।
सबसे पहले मैंने अखबार में विज्ञापन छपवाने की सोची। लेकिन यह फैसला मैंने पहले ही ले लिया था कि अखबार में विज्ञापन तो देंगे क्लासीफाइड में नहीं देंगे क्योंकि विवाह योग्य युवतियों के बुढ़ाते हुए पेरेन्ट्स क्लासीफाइड के बारीक अक्षरों को ठीक से नहीं पढ़ सके तो सारा गुड़ गोबर हो जाएगा। इसलिए फोटो सहित अलग से विज्ञापन छपना चाहिए ताकि सबकी नजर पड़े। विज्ञापन का मैटर भी मैंने पूरा दिमाग लगाकर बनाया। लिखा कि ''विवाह की इच्छुक युवतियाँ नि:संकोच अपना बायोडेटा भेजे बिल्कुल नहीं डरे। विवाह योग्य वर-कवि सुरेन्द्र दुबे। पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें।''
अखबार के दफ्तार में अपना यह विज्ञापन सौंपते हुए मैंने टेबल पर पड़े अखबार को बड़ी हसरत से निहारा। बकायदा उसे अपने सिर से लगाकर कहा-''एक तेरा सहारा।'' अब मैं पूरी तरह निश्चित था। मैंने सोचा कि विवाह योग्य लड़कियों के पेरेन्ट्स को नींद तो आती नहीं। कल सुबह पाँच बजे अखबार में विज्ञापन देखते ही सात बजे तक तो मेरे घर आ जाएँगे। कल से अपना भाग्य बदलने वाला है यह सोचकर मैं सो गया। लेकिन मेरी तकदीर ही खराब थी। इस बार संपादक ने गलती कर दी। वैवाहिक विज्ञापनों के पन्ने पर छापने की बजाय उसने गलती से मेरा विज्ञापन शोक समाचार वाले पेज पर छाप दिया।
शोक समाचार वाले पेज छपने वाले विज्ञापनों को कोई भी ध्यान से नहीं पढ़ता। सिर्फ फोटो देखते ही समझ जाता है कि इसका विकेट उड़ चुका है। लिहाजा लड़कियों के पेरेन्टस तो आए लेकिन सुबह-सुबह मेरे घर के बाहर शवयात्रा में शामिल होने वाले लोगों का जमघट लग गया।
लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। मैंने तुरंत एक मैरीज ब्यूरो खोल लिया। अपने आफिस पर बड़ा सा बोर्ड टाँगकर उस पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखवाया-''दुल्हन वही जो दुबेजी दिलाए।'' चार दिन बाद बगल में दूसरा आफिस खुल गया जिसके बोर्ड पर लिखा था-''तलाक वही जो चौबे जी कराए।''
चौबे ने सोचा कि दुबे जो खुद शादी नहीं कर सका, जरुर दूसरों के ऊटपटांग रिश्ते करवाएगा। ऐसे में इसका हर कस्टमर छ: महीने बाद रोता हुआ मेरे पास आएगा। उसे सफलता के लिए अपनी योग्यता की तुलना में मेरी अयोग्यता पर ज्यादा भरोसा था। दोनों की कोशिशें अलग-अलग तरह की थी। मैं बंधन बेच रहा था और वह मुक्ति। सामाजिक सरोकारों से शून्य लोगों की मजबूरी है कि कभी मेरे पास आए और कभी उसके पास जाए। लेकिन हम दोनों के मनों में पता नहीं कौनसा डर है कि दोनों की नजर में एक-दूसरे का कस्टमर है।
-सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)


सुरेन्द्र दुबे (जयपुर) की पुस्तक
'डिफरेंट स्ट्रोक'
में प्रकाशित व्यंग्य लेख

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